षष्ठाष्टव्ययस्थं स्याल्लग्नमुच्चग्रंहं यदि।
तस्य रुद्रासनपदं निर्द्रिष्टं पूर्वसूरभि:॥
तुला लगन की कुंडली मे छ: आठ बारह भावो मे जब ग्रह बैठ जाते है तो रुद्रासन योग के उत्पत्ति होती है। यह तीनो भाव त्रिक भाव के नाम से जाने जाते है और जो भी सौम्य ग्रह इन भावो मे होता है वह दिक्कत देने वाला होता है तथा जो भी क्रूर ग्रह होता है वह जातक को फ़ायदा देने वाला होता है। लेकिन क्रूर ग्रह की युति जब गोचर से लगन या अच्छे भाव मे होती है तो वह अपनी क्रिया से अपने जन्म के समय के भाव के लिये अपनी गति या शक्ति को प्रदान करता है। रुद्रासन योग की फ़लदायी स्थिति का समय जीवन की सोलहवी साल से शुरु होता है। जन्म के पहले महिने मे या तो मां की वजह से परिवार मे बंटवारा हो जाता है या फ़िर मां के कारणो से परिवार से किसी भी प्रकार से बिछोह हो जाता है। जन्म के आठवे महिने मे बहुत तेज बुखार होता है या किसी असावधानी से जातक को गर्म पानी से जलना हो जाता है। जन्म की दूसरी साल मे पिता को बहुतायत से दिमागी परेशानी शुरु हो जाती है। इन्ही दिमागी परेशानियों के कारण पिता की बीमारी का समय भी शुरु हो जाता है। यह समय जातक के लिये अच्छा भी होता है और बुरा भी होता है। जब दसवे भाव के स्वामी चन्द्रमा की दशा मे शुक्र का अन्तर शुरु होता है तभी पिता के लिये कठिन समय माना जाता है,माता के द्वारा पिता को तरह तरह से अपमानित किया जाता है और पिता का दिमाग घरेलू रिस्तो से दूर होता चला जाता है। जब भी मिथुन राशि मे शनि का आना होता है जातक का बहुत ही कठिन समय शुरु होता है,यह समय जातक की आलसी वृत्तियों के कारन भी माना जाता है। लेकिन इस समय मे जातक को अच्छे और बुरे दोनो प्रकार के अनुभव सामने आते है। जब शनि का गोचर लगन से पंचम से या नवम से पंचम के त्रिकोण मे आता है तो जातक को या तो रहने वाले स्थान से दूर करता है या रहन वाले स्थान के लोगों द्वारा कोई न कोई आक्षेप देकर दूर कर दिया जाता है।
तस्य रुद्रासनपदं निर्द्रिष्टं पूर्वसूरभि:॥
तुला लगन की कुंडली मे छ: आठ बारह भावो मे जब ग्रह बैठ जाते है तो रुद्रासन योग के उत्पत्ति होती है। यह तीनो भाव त्रिक भाव के नाम से जाने जाते है और जो भी सौम्य ग्रह इन भावो मे होता है वह दिक्कत देने वाला होता है तथा जो भी क्रूर ग्रह होता है वह जातक को फ़ायदा देने वाला होता है। लेकिन क्रूर ग्रह की युति जब गोचर से लगन या अच्छे भाव मे होती है तो वह अपनी क्रिया से अपने जन्म के समय के भाव के लिये अपनी गति या शक्ति को प्रदान करता है। रुद्रासन योग की फ़लदायी स्थिति का समय जीवन की सोलहवी साल से शुरु होता है। जन्म के पहले महिने मे या तो मां की वजह से परिवार मे बंटवारा हो जाता है या फ़िर मां के कारणो से परिवार से किसी भी प्रकार से बिछोह हो जाता है। जन्म के आठवे महिने मे बहुत तेज बुखार होता है या किसी असावधानी से जातक को गर्म पानी से जलना हो जाता है। जन्म की दूसरी साल मे पिता को बहुतायत से दिमागी परेशानी शुरु हो जाती है। इन्ही दिमागी परेशानियों के कारण पिता की बीमारी का समय भी शुरु हो जाता है। यह समय जातक के लिये अच्छा भी होता है और बुरा भी होता है। जब दसवे भाव के स्वामी चन्द्रमा की दशा मे शुक्र का अन्तर शुरु होता है तभी पिता के लिये कठिन समय माना जाता है,माता के द्वारा पिता को तरह तरह से अपमानित किया जाता है और पिता का दिमाग घरेलू रिस्तो से दूर होता चला जाता है। जब भी मिथुन राशि मे शनि का आना होता है जातक का बहुत ही कठिन समय शुरु होता है,यह समय जातक की आलसी वृत्तियों के कारन भी माना जाता है। लेकिन इस समय मे जातक को अच्छे और बुरे दोनो प्रकार के अनुभव सामने आते है। जब शनि का गोचर लगन से पंचम से या नवम से पंचम के त्रिकोण मे आता है तो जातक को या तो रहने वाले स्थान से दूर करता है या रहन वाले स्थान के लोगों द्वारा कोई न कोई आक्षेप देकर दूर कर दिया जाता है।
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