Monday, July 18, 2011
महर्षि जैमिनि द्वारा शिव-ताण्डव-स्तोत्र कथन
काम्पिल्य देश में निवास करने वाली देवी,ब्रह्मा विष्णु और शिव तुम्हारे चरणारविन्दो में मस्तक झुकाते है। जगदम्ब,तुम्हें नमस्कार है। विघ्न,ब्रह्मा सूर्य चन्द्रमा इन्द्र और विष्णु आदि आपकी वन्दना करते है। गणपते,आप ब्राह्मणों तथा ब्रह्माजी के अधिपति है,आपको नमस्कार है। उमा देवी अपने कोमल करारविन्दों से जिनके ललाट में तिलक लगाती है जो कानों में कुण्डल तथा गले में कमल पुष्पों की माला धारण करते है,उन कुमार कार्तिकेय को मैं प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदि के लिये भी जिनका दर्शन करना अत्यन्त कठिन है उन भगवान शिव की स्तुति कौन कर सकता है,तथापि प्रभो आपके दर्शन से मेरे द्वारा स्वत: स्तुति होने लगी है,ठीक उसी तरह से जैसे मेघों की घटा से स्वत: वर्षा होने लगती है। अम्बा पार्वती सहित भगवान शिव को नमस्कार है। संहारकारी शर्व एवं कल्याणकारी शम्भु को नमस्कार है। ताण्डवनृत्य करने आले सभापति रुद्र देव को मेरा नमस्कार है। निनके परों की धमक से सम्पूर्ण लोक विदीर्ण होने लगते है,मस्तक के आघात से ब्रह्माण्ड की दीवार फ़ट जाती है और भुआओं के आघात से समस्त दिगन्त विभ्रान्त हो उठता है,उन भगवान भूतनाथ को मेरा नमस्कार है। ताण्डव के समय निनके युगल चरणों में नूपुर की छम छम ध्वनि होती रहती है,जिनके कटि भाग में चर्ममय वस्त्र सुशोभित होता है,और जो नागराज की मेखला धारण करते है,उन भगवान पशुपति को मेरा नमस्कार है। जो काल के भी काल है सोमस्वरूप भोगशक्ति सम्पन्न तथा हाथ में शूल धारन करने वाले हैं,उन जगत्पति शिवको नमस्कार है। भगवन,आप सम्पूर्ण जगत के पालक समस्त देवताओं के नेता तथा पर्वरों और क्षेत्रों के अधिपति है,आपको नमस्कार है। मंगलस्वरूप शिव को नमस्कार है। आत्मा के अधिपति आपको नमस्कार है,समस्त कामनाओं की वर्षा करने वाले आपको नमस्कार है,आप आठ अंगों युक्त और अत्यंत मनोरम स्वरूप वाले है,क्लेश में पडे हुये भक्तों को अभीष्ट वस्तु प्रदान करने वाले है,आप दक्ष यज्ञ के नाशक और परम संतुष्ट है,आप पाम्चों भूतों के स्वामी काल के नियन्ता आत्मा के अधीश्वर तथा सम्पूर्ण दिशाओं के पालक है,आपको बारंबार नमस्कार है। जो सम्पूर्ण विश्व के कर्ता जगत का भरण पोषण करने वाले तथा संसार का संहार करने वाले है,अग्नि निनका नेत्र और विश्व जिनका स्वरूप है,उन भगवान महेश्वर को नमस्कार है,ईशान तत्पुरुष वामदेव सद्योजात आपको नमस्कार है। भस्म ही जिनका आभूषण है,जो भक्तों का भय भंग करने वाले है जो भव यानी जगत की उतपत्ति के के कारण,भर्ग यानी तेजस्वरूप रुद्र यानी दुखनिवारण करने वाले है तथ मीढवान यानी भक्तों की आशा को सींचने वाले है उन भगवान शिव को मेरा नमस्कार है। जिनके कपोल ललाट भौंहें तथा शरीर सभी परम सुन्दर है,जो सोमस्वरूप है उन भगवान शिव को नमस्कार है,भगवन,सांसारिक क्लेश के कारण होने वाले महान भय का सदा के लिये आप उच्छेद करने वाले है,भक्तों पर कृपा की वर्षा करने वाले आपको नमस्कार है। जो आनन्द के समुद्र तथा ताण्डवलास्य के द्वारा परम सुन्दर प्रतीत होते है उन सम्पूर्ण जगत के स्वामी तथा देवसभा के अधीश्वर अद्भुत देवता महादेव को मैं नमस्कार करता हूँ। यक्षराज कुबेर जिन्हे अपना इष्टदेव मानते है उन अविनाशी परम प्रभु महेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ। जो एक बार भी प्रणाम करने वाले भक्त को संसार रूपी महासागर से तार देते है उन चराचर जगत के स्वामी भगवान ईशान को मैं प्रणाम करता हूँ। जो जगत के धारण पोषण करने वाले और ईश्वर है,समस्त सम्पत्तियों के दाता है,देवताओं के नेता विजेता तथा स्वयं कभी पराजित न होने वाले है उन भगवान शिव की मैं वन्दना करता हूँ। जो मुझे औ रिन तीनों लोकों को रचकर सबका धारण पोषण करते है उन काल के भी नियन्ता आप भगवान गंगाधर की मैं वन्दना करता हूँ। जिनसे यजुर्वेद के साथ ऋगवेद और सामवेद प्रकट हुये है,उन सर्वश सर्वव्यापी सर्वस्वरूप विद्वान एवं ईश्वर शिव की मैं वन्दना करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्व को सब ओर से देखते रहते है तथा जिनके भय से भूत वर्तमान और भविष्य जगत के जीव पापकर्मों का त्याग करते है,उन सर्वोत्तम द्रष्टा आप भगवान शिव की मैं वन्दना करता हूँ।जो देवताओं के नियंता और समस्त पापों को हर लेने वाले है,उन भगवान शिव को मैं प्रणाम करता हूँ। उत्तम ज्ञान से सम्पन्न शान्त सन्यासी अपने ह्रदय कमल में जिन कल्याणमय परमात्मा की उपासना करते है,उन ईशान सेव को मैं प्रणाम करता हूँ। ईश ! मैं अज्ञानी अत्यन्त क्षीण अशिक्षित असहाय अनाम दीन विपत्तिग्रस्त तथा दरिद्र हूँ,आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं दुर्मुख दुष्कर्मी दुष्ट तथा दुर्दशाग्रस्त हूँ आप मेरी रक्षा कीजिये। मै आपके अलावा और दूसरे को ऐसा नही देखता,जिसको सिद्धि के लिये वरण करूँ। शम्भो,राग द्वेष तथा मद की लपटों से प्रज्वलित संसार रूपी अग्नि के द्वारा हम दग्ध हो रहे है,दयालो आप हमारी रक्षा कीजिये,आपके अनेक नाम है और बहुतो ने आपका स्तवन किया है,हर ! मैं परायी स्त्री पराये घर पराये वस्त्र पराये अन्न तथा पराये आश्रय में आसक्त हूँ,आप मेरी रक्षा करें,मुझे विश्व भरण पोषण करने वाली धन सम्पत्ति के साथ उत्तम विद्या दीजिये। देवेश ! अनिष्ट तो मुझे सहस्त्रों मिलते है,कुंतु इष्ट वस्तु का सदा वियोग ही बना रहता है,आप मेरे मानसिक रोग का नाश कीजिये। भगवन ! आप महान हैं। देवेश ! आप ही हमारे रक्षक है,दूसरा कोई मेरी रक्षा करने वाला नही है,आप ब्रह्माजी के भी अधिपति है,अत: मुझे स्वीकार करके मेरी रक्षा कीजिये। उमापते ! आप ही मेरे माता पिता पितामह आयु बुद्धि लक्ष्मी भ्राता तथा सखा है। देवेश ! आप ही सब कर्म के कर्ता है,अत: मैने जो भी दुष्कर्म किया है,वह सब आप क्षमा करें। प्रभुता में आपकी समता करने वाला कोई नही है,और लघुता में मैं अपनी सानी रखता। अत: देव ! महादेव ! मै आपका हूँ,और आप मेरे हैं। आपके मुख पर सुन्दर मुस्कार सुशोभित है। गोरे अंगों में लगी हुयी विभूति उनकी गौरता को और बढा रही है। आपका श्रीविग्रह बालसूर्य के समान तेजस्वी तथा सौम्य है। आपका मुख सदा प्रसन्न रहता है,तथा आप शान्तस्वरूप है। मैं मन और वाणी के द्वारा आपके गुणों का गान करता हूँ। ताण्डव नृत्य करते और मेरी ओर देखते हुये आप भगवान उमाकान्त को हम सैकडों वर्षों तक निहारते रहते रहें,यही हमारा अभीष्ट वर है। महाभाग ! भगवन ! हम आपके प्रसाद से नीरोग विद्वान और बहुश्रुत होकर सकडों वर्षों तक जीवित रहें। ईशान ! स्त्री तथा भाई बन्धुओं के साथ आपके ताण्डव रूपी अमृत का यथेष्ठ पान करते रहें। देवदेव ! महादेव ! हम इच्छानुसार आपके चरणारविन्दों के मधुर मकरन्द का पान करते हुये सौ वर्षों तक आमोद में मग्न रहें। महादेव ! हम प्रत्येक जन्म में कीट नाग पिशाच अथवा जो कोई भी क्यों न हो,सैकडों वर्षों तक हम आपके दास बने रहें। ईश ! देव ! महादेव ! हम सभा में अपने कानों द्वारा आपके नृत्य वाद्य तथा कण्ठ की मधुर ध्वनि का सकडों वर्षों तक श्रवण करते रहें। जो स्मरण मात्र से संसार बन्धन का नाश करने वाले है,आपके उन दिव्य नामों का हम सैकडों वर्षो तक कीर्तन करते रहें। जो नित्य तरुण समूर्ण विश्व के अधिपति तथा त्रिकालदर्शी विद्वान है,उन भगवान शिव का मैं कब दर्शन करूंगा। जिसमें बहुत से पाप भरे हुये है,जिसने कभी लेशमात्र भी पुण्य का उपार्जन नही किया है,तथा जिसकी बुद्धि अत्यन्त खोटी है,ऐसे मुझ अधम को भगवान महेश्वर क्या कभी अपना सेवक जानकर स्वीकार करेंगे ? गायकों ! तुम गाओ; यदि राग आदि प्राप्त करना चाहते हो तो कुबेर के सखा भगवान शिव की महिमा गान करो। सखी जिव्हा !तेरा कल्याण हो।तू व्द्यादाता उमापति की उच्च स्वर से स्तुति बोला कर।अजन्मा जीव । तू शान्तभाव से चेत जा,क्या तुझे यह ज्ञात नही है कि इन भगवान शिव की तृप्ति से यह सम्पूर्ण जगत तृप्त होता है। इसलिये उनके नामामृत पान कर। ऐ मेरे चित्त ! जिनकी गन्ध मनोहर और स्पर्श सुखद है,जो सबकी इच्छा पूर्ण करने वाले है,तथा चन्द्रमा जिनका आभूषण है,उन भगवान शंकर का गाढा आलिंगन कर। त्रिपुरासुर का अन्त करने वाले भगवान शिवको नमस्कार है। तीनो लोकों मे स्वामी दिगम्बर शिव को नमस्कार है,भव की उत्पत्ति के कारण भगवान शिव को नमस्कार है। प्रभो ! आपकी असंख्य प्रजायें है तथा आपका स्वरूप अत्यन्त विचित्र है। आपसे ही जगत की उत्पत्ति हुयी है। जिनका सुवर्णमय पादपीठ देवराज इन्द्र के महाकिरीट में जडे हुये नाना प्रकार के रत्नों से आवृत होता है,भस्म ही जिनका अंगराग है,तथा जिनसे भिन्न पर अथवा अपर किसी भी वस्तु की सत्ता नही है,उन परमेश्वर शिव को नमस्कार है। जिन आप में यह सम्पूर्ण जगत प्रकट होता और विलीन हो जाता है,जो छोटे से छोटे और बडे बडे है,जिनका कहीं अन्त नही है,जो अव्यक्ति अचिन्त्य एक दिगम्बर आकाशस्वरूप अजन्मा पुराणपुरुष तथा यज्ञयूपमय है,उन भगवान हर को मैं प्रणाम करता हूँ। पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण तथा ऊपर नीचे सब ओर वे ही तो है। जो चन्द्रमा का मुकुट धारण करते है तथा जो परमानन्दस्वरूप एवं शोक दुख से रहित है,सब के ह्रदय कमल में परमात्मस्वरूप से जिनका निवास है,जिनसे सम्पूर्ण दिशायें और अवान्तर दिशायें प्रकट हुई है,उन शिवस्वरूप भगवान महेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ। चन्द्रमौले ! राग आदि कपट दोष के कारण प्रकत हुये भवरूपी महारोग से मैं बडी घबराहट में हूँ। अपनी कृपा द्रिष्टि से मुझे देखकर आप मेरी रक्षा कीजिये,क्योंकि वैद्यों में आप सबसे बडे वैद्य है। मेरे मन में दुख का महासागर उमड आया है,मैं लेशमात्र सुख से भी वन्चित हूँ,पुण्य का तो मैने कभी स्पर्श भी नही किया है,और मेरे पातक असंख्य है,मै मृत्यु के हाथ में आ गया हूँ,और बहुत डरा हुआ हूँ,भगवान भव ! आप आगे पीछे ऊपर नीचे सब ओर से मेरी रक्षा कीजिये। महेश ! मैं असार संसार रूपी महासागर में डूबकर जोर जोर से क्रन्दन कर रहा हूँ,मेरा राग बहुत बढ गया है,मैं सर्वथा असमर्थ हो गया हूँ,आप अपनी कृपा द्रिष्टि से मेरी रक्षा कीजिये। जिनके मुख पर मनोहर मुसकान की छटा छा रही है,चन्द्रमा की कला जिनके मस्तक का आभूषण बनी हुयी है,तथा जो अन्धकार से परे है,उन सूर्य के समाज तेजस्वी भगवान शिव का मता पार्वती के साथ कब दर्शन करूंगा ? अनादि काल से मुक्ति की इच्छा रखने वाले जीवों ! तुम लोग यहाँ आओ और अपने ह्रदय कमल में भगवान शिव का चिन्तन करो; क्योंकि जिन्होने वेदान्त-शास्त्र के विज्ञान के द्वारा उसके अर्थभूत परमात्मा को पूर्ण निश्चय पूर्वक जान लिया है,वे ज्ञानी जन मोक्ष के लिये सदा उन्ही का ध्यान करते है,जो उत्तम पुत्र की इच्छा रखने वाले है,वे मनुष्य भी इन नित्य तरुण भगवान शिव की आराधना करें। इन्ही से सृष्टि के आरम्भ में जगद्वधाता स्वयम्भू ब्रह्माजी प्रकट हुये थे। बहुत कहने से क्या लाभ ? इस भगवान शिव की शरण में जाने से समस्त कामनायें सिद्ध होती है। पूर्वकाल में इन्ही की शरण लेकर महर्षि अगस्त्य दिन रात में वृद्धावस्था से युवा हो गये थे। ऐ मेरे नेत्र रूपी भ्रमरों ! तुम और सब कुछ छोड कर सदा इन भगवान शिवका आश्रय लो। ये आमोदवान यानी सुगन्ध और आनन्द से परिपूर्ण है,और मृदु यानी कमल से भी कोमल है। परम स्वादिष्ट और मधुर है,ये तुम्हारा कल्याण करेंगे। हे मनुष्य ! तुम भगवान शिव की धरण लेकर ऐसे हो जाओगे कि तुम्हारी किसी से भी तुलना नही हो सकेगी। तुम समस्त मनुषों और देवताओं को भी अपने गुणों से परास्त कर सकोगे। वाणी ! तुम्हे नमस्कार है,तुम ह्रदय गुफ़ा में शयन करने वाले इन नित्य तरुण भगवान महेश्वर की स्तुति करो। मन ! तू जिस जिस अभीष्ट वस्तु का चिन्तन करेगा,वह सब तुझे अवश्य प्राप्त होगी। विषयों में कभी दुख से छुटकारा नही मिल सकता । हम ह्रदय की शुद्धि के लिये भगवान रुद्र की आराधना करेंगे। दयालु भगवन ! हमने पूर्वकाल में जो अज्ञानवश जो आपके विरुद्ध अपराध या दुष्कर्म का अनुष्टान किया है,वह सब क्षमा करके जैसे पिता अपने पुत्र को आश्रय देता है उसी प्रकार से आप हमे अपनाइये। संसार नामक क्रोध में भरे हुये सर्प ने राग द्वेष उन्माद और लोभ आदि रूप तीखे दांतों से मुझे डंस लिया है। इस अवस्था में मुझे देखकर सबकी रक्षा करने वाले दयालु देवता पिनाकधारी भगवान शिव मेरी रक्षा करे। रुद्रदेव ! जो लोग समाधि के अन्त में उपर्युक्त वचन कहकर आपको नमस्कार करते है,वे जन्म मृत्यु रूपी सर्प से डसे हुये लोग संत होकर आपको प्राप्त होते है। नीलग्रीव ! मैं जीवात्मारूप से ब्रह्माजी के साथ आपकी वन्दना करता हुआ आपकी ही शरण में आता हूँ। अनाथ नाथ वसु स्वरूप ! महेश्वर ! हम सांसारिक चिन्ता के भीषण ज्वर से पीडित है,बडे बडे रोगों से ग्रस्त हो गये है,समस्त पातकों के निवास स्थान बने हुये है,काल की द्रिष्टि हमसे दूर नही है,ऐसी दशा में आप अपने औषधरूप हाथ से हमारा स्पर्श करें। शूरवीर ! आपका करस्पर्श सब प्रकार की सिद्धियों का हेतु है। आप काल के भी काल है। संसार की उत्पत्ति के हेतु भगवान वव को नमस्कार है। भस्म भूषित वक्षवाले हर को नमस्कार है। संसार के पराभव और भय में साथ देने वाले पिनाकधारी रुद्र को नमस्कार है। विश्व के पालक कल्याण स्वरूप शिव को नमस्कार है। जीव के सनातन सखा उन महेश्वर को नमस्कार है,जिनके सखा रूप जीव को न तो कोई मार सकता है,और न कोई परास्त कर सकता है। देवताओं के पति इन्द्र के भी स्वामी भगवान शिव को नमस्कार है। प्रजापतियों के और भूमिपतियों के भी अधिपति भगवान शिव को नमस्कार है,तथा अम्बिकापति उमापति को नमस्कार है,नमस्कार है। जो प्रणतजनों की पीडा का नाश करने वाले,त्रिकालदर्शी,विद्वानों में भी सबसे श्रेष्ठ विद्वान और उत्तम यश वाले है,उन भगवान गणेश को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ। देगालोग युद्ध में जिन स्कन्द स्वामी का आवाहन करके विजय पाते है,उन सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान सुब्रह्मण्यम की मैं वन्दना करता हूँ। सुब्रह्मण्यम स्कन्द स्वामी सच्चिदानन्द मय है। कल्याणमयी जगदम्बिका को नमस्कार है। कल्याणमय विग्रहवालीं शिवप्रिया को नमस्कार है। जिनके शरीर की कान्ति सुवर्ण के समान है,जो अपने चरणों में मणिमय नूपुर धारण करती है,जिनका मुख सदा प्रसन्न रहता है,जो अपने हाथों में कमल धारण किये रहती है,जिनके नेत्र विशाल है जो भाषा शास्त्र की विदुषी तथा उत्तम वचन बोलने वाली है,उन गौरीदेवी को मैं प्रणाम करता हूँ। मैं मैना की पुत्री इन उमादेवी को नमस्कार करता हूँ। जो अप्रमेय हैं,जिनके सौन्दर्य आदि दिव्य गुणों का माप नही है तथा जो परम कान्तिमती है,एवं जो सदा भगवान शंकर के पार्श्वभाग में रहती है,और समस्त भुवनों को देखा करती है,उन पार्वती देवी को मैं नमस्कार करता हूँ,दीन जनों की रक्षा जिनके लिये मनोरंजन का कार्य है,जो मान और आनन्द देती है तथा जो विद्याओं और मधुर एवं मंगलमयी वाणी की नायिका और सिद्धि की स्वामिनी है,उन पार्वती जी को मैं प्रणाम करता हूँ। भवानी ! आप सांसारिक ताप के महान भय का निवारण करने वाली हैं। अन्न वस्त्र आभूषण आदि एकमात्र आपके ही उपभोग है। शिवे ! आप मुझे वह श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान कीजिये,जो कहीं भी कुण्ठित न होने वाली हो तथा जिसके द्वारा हम समस्त पापों को लांघ जायें। शिवे ! आपकी उपमा कैसे और कहाँ दी जाये । सम्पूर्ण जगत की सृष्टि आपके लिये खिलवाड है। कल्याणमय भगवान शिव आपके पति है। साक्षात भगवान विष्णु आपके सेवक है। लक्ष्मी शची और सौभाग्यवती सरस्वती आपकी दासियां है तथा आप स्वं ही वसु रत्न धन सुवर्ण आदि देने वाली हैं।
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