कालपुरुष की कुंडली के अनुसार मकर राशि भचक्र से दसवें भाव की राशि है और इस राशि को कर्म के प्रति माना जाता है,इस राशि के लिये समानन्तर चलने वाली राशियां वृष और कन्या राशिया है। मकर राशि का स्वभाव विद्वानो ने मकर यानी पानी मे रहने वाले जन्तु मगरमच्छ से जुडा माना है,जो अपने ही क्षेत्र मे रहने वाली और स्वभाव से कठोर प्रकृति का माना जाता है। अक्सर मगरमच्छ को देखने से पता लगता है कि उसका पीठ वाला हिस्सा बहुत मजबूत होता है,और पेट वाला हिस्सा बहुत मुलायम होता है,आगे के भाग मे बहुत ही खतरनाक जबडा होता है जो किसी भी जीव को पकडने के बाद छोडता नही है और जब उसका वश नही चलता है तो अपनी खतरनाक पूंछ से वार करने के बाद जीव को मरणाशन्न अवस्था मे छोडता है। यह जीवन को दोहरे रूप मे जीने वाली राशि भी मानी जाती है,यानी इस राशि वाले व्यक्ति ने दोहरा जीवन जिया होता है,एक अपने लिये और एक दूसरे लोगों के लिये। शनि की चालाकी और कार्य करने मे अपने स्वार्थ को देखने के बाद ही यह राशि अपने प्रभाव को प्रकाशित और प्रसारित करने वाली राशि है। इस राशि का भौतिक स्वभाव धन और परिवार की मर्यादा से बाहर चलता देखा जाता है,अपने को प्रदर्शन मे लाने के लिये इस राशि वाले व्यक्ति बहुत बढ चढ कर बोलने वाले होते है,यह मानसिक रूप से अपने को पूरी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिये हमेशा तैयार करते है। इनके पंचम भाव मे शुक्र की वृष राशि होने से यह सबसे पहले अपने प्रेम प्रदर्शन आदि मे धन और कुटुम्ब आदि की योग्यता को परखते है,अक्सर इनका प्रेम सम्बन्ध भी दोहरा माना जा सकता है,धन के लिये यह एम्यूजमेन्ट और इसी प्रकार के कार्यों मे अपने को आगे रखते है। इनकी कार्य करने की योजना अधिकतर कमन्यूकेशन प्रणाली पर टिकी होती है और यह अपने को कही कही पर बहुत बडा वक्ता मानते है साथ ही इनके द्वारा किसी के भी प्रति कर्जा दुश्मनी बीमारी और अन्दरूनी जानकारी प्राप्त करने की बहुत बडी कला होती है,गुप्त रूप से कमन्यूकेशन करना इनका स्वभाव होता है,इनके सप्तम का स्वामी चन्द्रमा होने से अक्सर इन्हे अपने जीवन साथी के प्रति कभी भी सन्तुष्टि नही होती है,कारण शनि के आगे चन्द्रमा का स्वभाव बहुत ही नाजुक होता है। शादी के पहले अगर इस प्रकार के जातक के कोई प्रेम सम्बन्ध चल रहे होते है तो शादी के बाद इनके जीवन साथी का स्वभाव एक दम फ़्रीज होने लगता है। और मगर की पीठ की रूप रेखा मे इनके ऊपर बाहरी दुनिया का कोई भी असर बातों या मानसिक प्रहार का नही पडता है यह अपनी धुन मे मस्त रहने वाले होते है जीवन साथी के भावनात्मक लगाव से इनका कोई लेना देना नही होता है।
मकर राशि वाले जातकों की अष्टम मे पडने वाली राशि सिंह होती है इनकी नजर हमेशा राजनीतिक रूप से अपन परिवार और जीवन साथी के धन पर होती है,जीवन साथी के प्रति अष्टम भाव होने से और पारिवारिक अहम के कारण अक्सर शादी के बाद जीवन साथी के द्वारा इन्हे अनचाहे मन से ढोने जैसा कारण माना जा सकता है। अगर इनकी शादी किसी सिंह लगन वाले जातक से हो जाये तो जीवन साथी के लिये हमेशा अपमान जोखिम न्याय और सामाजिक प्रताणना सहने के लिये माना जा सकता है। इसका कारण मुख्य रूप से प्रसिद्ध ज्योतिषी जीवन नाथ के मत के अनुसार सूर्य शनि की युति का प्रभाव माना जा सकता है जैसे सिंह लगन का स्वामी सूर्य होता है और मकर लगन के मालिक शनि देव माने जाते है। शनि सूर्य का पुत्र जरूर है लेकिन दोनो मे जमीन आसमान का फ़र्क है जहां सूर्य की सीमा समाप्त होती है वहीं से शनि की सीमा शुरु हो जाती है। जीवननाथ जी ने यह भी कहा है कि अक्सर शादी करने के बाद पति पत्नी के आपसी विचारों मे असमानता पैदा हो जाती है और जीवन साथी का प्रभाव अपने परिवार से दूर होने लगता है तथा व्यक्ति के विचार अपने ससुराल खानदान से नही बनते है। जो भी भाई और भाई जैसे लोग होते है सूर्य शनि की युति मे मंगल के बद हो जाने से उनके विचारों मे परिवर्तन आने लगते है।
मकर लगन वाले जातकों के नवे भाव मे बुध की कन्या राशि आती है और बुध के प्रधान होने के कारण व्यक्ति का धर्म कर्म कानून आदि सभी क्षेत्रो मे कोई न कोई अडचन बनी ही रहती है। व्यक्ति के पिता की औकात उनकी बहिन बुआ या बेटी के द्वारा ही उठाई जाती है अन्यथा पिता का एक गरीब परिवार मे जन्म लेना और माता का बडे परिवार से होना उनके लिये दिक्कत वाला जीवन बिताना पडता है,अक्सर देखा गया है कि इस लगन के व्यक्ति के पिता का कार्य या तो बीमा या मृत्यु के बाद की सम्पत्तियों के निस्तारण के लिये माना जाता है कानूनी रूप से कार्य करने वाले बैंक आदि मे काम करने वाले लोग अक्सर इस लगन मे पैदा होने वाले जातको के लिये माने जा सकते है। वैसे अगर मंगल इस लगन के दूसरे स्थान मे होता है तो जातक के पैदा होने के बाद पिता की औकात या तो समाप्त हो जाती है या किसी न किसी प्रकार से कोर्ट कचहरी के कारण पिता से सम्बन्धित जायदाद आदि के लिये चला करते है। मंगल की युति अगर राहु से होती है तो भी अक्सर अचानक होने वाले हादसो के लिये पिता के परिवार को समझा जा सकता है। दूसरे भाव का मंगल भी जातक को मंगली दोष देता है लेकिन लगन का वक्री मंगल भी जातक को मंगली दोष नही देता है,ज्योतिष प्रेमियों को यह बात ध्यान मे रखकर चलने की जरूरत है।
मकर लगन के दसवे भाव मे शुक्र की तुला राशि आती है,और शुक्र की तुला राशि का होना तथा शनि का इस राशि मे बैठना वैसे तो शनि को उच्च का बनाता है लेकिन शनि की दसवी मारक द्रिष्टि जीवन साथी और साझेदार के भाव मे जाने से जातक के साथ की जाने वाली मन्त्रणा मे जातक को हराया नही जा सकता है कारण जातक कभी तो बहुत ही भावनात्मक बाते करेगा और कभी अक्समात ही कठोर होकर भावनात्मक बातों को फ़्रीज करने के लिये अपनी शनि वाली चतुराई को पैदा करने लगेगा। लालकिताब का उसूल है कि जब भी शनि दसवे भाव मे होता है तो वह गृहस्थी नही चल पाती है,और जब तुला का शनि होता है तो हमेशा कानूनी कारण बनते है जो कि आखिर मे अपने जीवन साथी के प्रति या तो दूर जाने के कारण बनते है या फ़िर किसी प्रकार से दूसरे सम्बन्धो को अपने साथ लेकर चलने के कारण जीवन को धक्का देकर चलाया जाता है। दसवे भाव का सीधा सम्बन्ध छठे भाव से भी होता है अगर यहां राहु केतु या मंगल जैसे ग्रह विराजमान होते है तो जातक का गुप्त रूप से दूसरा सम्बन्ध भी चलना माना जाता है। राहु के होने से जातक का प्रभाव एक प्रकार से धार्मिक और सामाजिक मर्यादा को दूर करना होता है कारण बुध की मिथुन राशि आने के कारण जातक का स्वभाव झूठ बोलना और अन्दरूनी रूप से किसी के प्रति भी अपनी बातों को और स्वभाव को आगे रखने का होता है। वैसे शनि की सिफ़्त को धीमा भी माना गया है,जैसे जीवन साथी के प्रति इस शनि की दसवी मारक द्रिष्टि सप्तम भाव पर पडने से जीवन साथी की गतिविधियों को फ़्रीज करना तो होता ही है साथ मे तुला राशि का शनि उच्च प्रभाव के कारण न्याय और सामाजिक व्यवस्था मे अपने झूठ को प्रयोग करने के बाद जीवन साथी के आगे के जीवन को भी प्रताणित करना होता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार इस शनि की स्थिति पिता के भाव मे होती है और माता से यह भाव सातवा पडता है,माता का स्वभाव भी जोर से बोलने का माना जाता है,तथा माता के द्वारा दोहरी व्यवसायिक सम्पत्ति से अपने परिवार के जीवन के लिये भी कोई न कोई उपक्रम चलाना पडता है। अगर गुरु किसी प्रकार से इस शनि के आगे होता है तो जातक का जीवन बचत किये गये धन और मृत्यु के बाद की सम्पत्ति को सम्भालने के लिये माना जाता है,यह गुरु दो भाइयों की औकात देता है,साथ ही बडे भाई का काम किसी विदेशी मामले मे या किसी उच्च न्याय आदि के काम करने के लिये भी माना जाता है,अक्सर इस युति मे पिता के बाद की नौकरी आदि भाई या सम्बन्धियों को मिलना भी देखा गया है।
शनि का योगात्मक रूप अगर किसी प्रकार से दूसरे भाव के मंगल और छठे भाव के राहु से मिल रहा हो तो यह योग खतरनाक रूप से न्याय या बनिया बुद्धि से काटने वाला माना जाता है,इस युति के कारण जातक को जो मंगली दोष लगता है वह बहुत ही खतरनाक माना जाता है। तुला के शनि की नजर अगर बारहवे केतु पर पड रही हो तो जातक का रहना विदेश मे भी हो सकता है और विवाह के बाद पैदा हुये इकलौते पुत्र को दूर भी रहना पड सकता है। राहु मन्गल शनि की युति जातक को मीडिया या बडी कमन्यूकेशन कम्पनी या लीगल रूप से किये जाने वाले कामो मे अपने प्राथमिक जीवन को ले जाती है। अगर लगन मे शुक्र विराजमान हो तो शनि और शुक्र का परिवर्तन योग भी माना जा सकता है जो पहले किसी प्रकार से अपने को अफ़ेयर आदि मे ले जाकर और उस अफ़ेयर को छोड कर या पहले पति की मौत के बाद मिलने वाले धन को लेकर दूसरे सम्बन्ध करने के लिये भी माना जाता है। भाग्येश बुध भी अगर लगन मे ही हो तो न्याय मे जाने की सौ प्रतिशति बात मिलती है भाग्येश अगर वक्री है तो कभी भी गृहस्थी टूटने का कारण बनता है।
मकर राशि वाले जातकों की अष्टम मे पडने वाली राशि सिंह होती है इनकी नजर हमेशा राजनीतिक रूप से अपन परिवार और जीवन साथी के धन पर होती है,जीवन साथी के प्रति अष्टम भाव होने से और पारिवारिक अहम के कारण अक्सर शादी के बाद जीवन साथी के द्वारा इन्हे अनचाहे मन से ढोने जैसा कारण माना जा सकता है। अगर इनकी शादी किसी सिंह लगन वाले जातक से हो जाये तो जीवन साथी के लिये हमेशा अपमान जोखिम न्याय और सामाजिक प्रताणना सहने के लिये माना जा सकता है। इसका कारण मुख्य रूप से प्रसिद्ध ज्योतिषी जीवन नाथ के मत के अनुसार सूर्य शनि की युति का प्रभाव माना जा सकता है जैसे सिंह लगन का स्वामी सूर्य होता है और मकर लगन के मालिक शनि देव माने जाते है। शनि सूर्य का पुत्र जरूर है लेकिन दोनो मे जमीन आसमान का फ़र्क है जहां सूर्य की सीमा समाप्त होती है वहीं से शनि की सीमा शुरु हो जाती है। जीवननाथ जी ने यह भी कहा है कि अक्सर शादी करने के बाद पति पत्नी के आपसी विचारों मे असमानता पैदा हो जाती है और जीवन साथी का प्रभाव अपने परिवार से दूर होने लगता है तथा व्यक्ति के विचार अपने ससुराल खानदान से नही बनते है। जो भी भाई और भाई जैसे लोग होते है सूर्य शनि की युति मे मंगल के बद हो जाने से उनके विचारों मे परिवर्तन आने लगते है।
मकर लगन वाले जातकों के नवे भाव मे बुध की कन्या राशि आती है और बुध के प्रधान होने के कारण व्यक्ति का धर्म कर्म कानून आदि सभी क्षेत्रो मे कोई न कोई अडचन बनी ही रहती है। व्यक्ति के पिता की औकात उनकी बहिन बुआ या बेटी के द्वारा ही उठाई जाती है अन्यथा पिता का एक गरीब परिवार मे जन्म लेना और माता का बडे परिवार से होना उनके लिये दिक्कत वाला जीवन बिताना पडता है,अक्सर देखा गया है कि इस लगन के व्यक्ति के पिता का कार्य या तो बीमा या मृत्यु के बाद की सम्पत्तियों के निस्तारण के लिये माना जाता है कानूनी रूप से कार्य करने वाले बैंक आदि मे काम करने वाले लोग अक्सर इस लगन मे पैदा होने वाले जातको के लिये माने जा सकते है। वैसे अगर मंगल इस लगन के दूसरे स्थान मे होता है तो जातक के पैदा होने के बाद पिता की औकात या तो समाप्त हो जाती है या किसी न किसी प्रकार से कोर्ट कचहरी के कारण पिता से सम्बन्धित जायदाद आदि के लिये चला करते है। मंगल की युति अगर राहु से होती है तो भी अक्सर अचानक होने वाले हादसो के लिये पिता के परिवार को समझा जा सकता है। दूसरे भाव का मंगल भी जातक को मंगली दोष देता है लेकिन लगन का वक्री मंगल भी जातक को मंगली दोष नही देता है,ज्योतिष प्रेमियों को यह बात ध्यान मे रखकर चलने की जरूरत है।
मकर लगन के दसवे भाव मे शुक्र की तुला राशि आती है,और शुक्र की तुला राशि का होना तथा शनि का इस राशि मे बैठना वैसे तो शनि को उच्च का बनाता है लेकिन शनि की दसवी मारक द्रिष्टि जीवन साथी और साझेदार के भाव मे जाने से जातक के साथ की जाने वाली मन्त्रणा मे जातक को हराया नही जा सकता है कारण जातक कभी तो बहुत ही भावनात्मक बाते करेगा और कभी अक्समात ही कठोर होकर भावनात्मक बातों को फ़्रीज करने के लिये अपनी शनि वाली चतुराई को पैदा करने लगेगा। लालकिताब का उसूल है कि जब भी शनि दसवे भाव मे होता है तो वह गृहस्थी नही चल पाती है,और जब तुला का शनि होता है तो हमेशा कानूनी कारण बनते है जो कि आखिर मे अपने जीवन साथी के प्रति या तो दूर जाने के कारण बनते है या फ़िर किसी प्रकार से दूसरे सम्बन्धो को अपने साथ लेकर चलने के कारण जीवन को धक्का देकर चलाया जाता है। दसवे भाव का सीधा सम्बन्ध छठे भाव से भी होता है अगर यहां राहु केतु या मंगल जैसे ग्रह विराजमान होते है तो जातक का गुप्त रूप से दूसरा सम्बन्ध भी चलना माना जाता है। राहु के होने से जातक का प्रभाव एक प्रकार से धार्मिक और सामाजिक मर्यादा को दूर करना होता है कारण बुध की मिथुन राशि आने के कारण जातक का स्वभाव झूठ बोलना और अन्दरूनी रूप से किसी के प्रति भी अपनी बातों को और स्वभाव को आगे रखने का होता है। वैसे शनि की सिफ़्त को धीमा भी माना गया है,जैसे जीवन साथी के प्रति इस शनि की दसवी मारक द्रिष्टि सप्तम भाव पर पडने से जीवन साथी की गतिविधियों को फ़्रीज करना तो होता ही है साथ मे तुला राशि का शनि उच्च प्रभाव के कारण न्याय और सामाजिक व्यवस्था मे अपने झूठ को प्रयोग करने के बाद जीवन साथी के आगे के जीवन को भी प्रताणित करना होता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार इस शनि की स्थिति पिता के भाव मे होती है और माता से यह भाव सातवा पडता है,माता का स्वभाव भी जोर से बोलने का माना जाता है,तथा माता के द्वारा दोहरी व्यवसायिक सम्पत्ति से अपने परिवार के जीवन के लिये भी कोई न कोई उपक्रम चलाना पडता है। अगर गुरु किसी प्रकार से इस शनि के आगे होता है तो जातक का जीवन बचत किये गये धन और मृत्यु के बाद की सम्पत्ति को सम्भालने के लिये माना जाता है,यह गुरु दो भाइयों की औकात देता है,साथ ही बडे भाई का काम किसी विदेशी मामले मे या किसी उच्च न्याय आदि के काम करने के लिये भी माना जाता है,अक्सर इस युति मे पिता के बाद की नौकरी आदि भाई या सम्बन्धियों को मिलना भी देखा गया है।
शनि का योगात्मक रूप अगर किसी प्रकार से दूसरे भाव के मंगल और छठे भाव के राहु से मिल रहा हो तो यह योग खतरनाक रूप से न्याय या बनिया बुद्धि से काटने वाला माना जाता है,इस युति के कारण जातक को जो मंगली दोष लगता है वह बहुत ही खतरनाक माना जाता है। तुला के शनि की नजर अगर बारहवे केतु पर पड रही हो तो जातक का रहना विदेश मे भी हो सकता है और विवाह के बाद पैदा हुये इकलौते पुत्र को दूर भी रहना पड सकता है। राहु मन्गल शनि की युति जातक को मीडिया या बडी कमन्यूकेशन कम्पनी या लीगल रूप से किये जाने वाले कामो मे अपने प्राथमिक जीवन को ले जाती है। अगर लगन मे शुक्र विराजमान हो तो शनि और शुक्र का परिवर्तन योग भी माना जा सकता है जो पहले किसी प्रकार से अपने को अफ़ेयर आदि मे ले जाकर और उस अफ़ेयर को छोड कर या पहले पति की मौत के बाद मिलने वाले धन को लेकर दूसरे सम्बन्ध करने के लिये भी माना जाता है। भाग्येश बुध भी अगर लगन मे ही हो तो न्याय मे जाने की सौ प्रतिशति बात मिलती है भाग्येश अगर वक्री है तो कभी भी गृहस्थी टूटने का कारण बनता है।
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