Thursday, June 28, 2012

वास्तु के अटल नियम

  1. सूर्योदय की पहली किरण का अवरोध मकान के लिये विध्वंशकारी होता है,मन्दिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा के दक्षिण पश्चिम में जगह खाली होती है या वीराना होता है भूल से कोई मकान होता भी है तो मकान मे रहने वाले नही होते है.
  2. दक्षिण का कुआ घर मे उपरत्व के प्रभाव को पैदा करते है या तो घर मे पुरुष संतति होती ही नही है और होती भी है तो नकारा होती है.
  3. घर के ईशान में गन्दगी घर के सदस्यों के अन्दर चरित्र की स्थिति को संदिग्ध रखते है पिता पुत्र के बीच भी वैमनस्यता का होना जरूरी हो जाता है पति पत्नी के बीच रिस्तो में दरार आना और बेकार के रिस्ते बनना भी देखा जाता है.
  4. दलाली के काम करने वाले अक्सर जीवन के किसी भी एक भाग मे अपंगता को ग्रहण कर लेते है और उनकी पहिचान उनके दक्षिण पश्चिम में खिडकी या रोशनदान से होती है.
  5. मकान का अग्नि मुखी दरवाजा आग और चोरी का कारक होता है,यह सब स्त्रियों के कारण ही होता है या तो स्त्री अपने घर के भेद को बाहर देती है या स्त्री के अन्दर बेकार की हवाये आकर मन को उद्वेलित करती है.
  6. घर के वायव्य में झूला का होना किस्मत और प्रसिद्धि को हवा मे झुलाने के लिये माना जाता है,यहां तक कि खुद के रिस्तेदार भी कभी तो अच्छा बोलने लगते है और कभी बुराई करने लगते है.
  7. दक्षिण पश्चिम मुखी मकान मे कोई एक व्यक्ति अपंग जरूर होता है और अपंगता भी खुद के व्यसनो के कारण ही होती है.
  8. घर के दरवाजे पर लकडी या अन्य प्रकार की काटने वाली मशीन से घर में घर के सदस्य ही एक दूसरे को अपने अपने स्वार्थ के लिये काटने लगते है.
  9. जन्म स्थान से पूर्व दिशा की ससुराल पुत्र सन्तान मे कमी देती है पश्चिम की ससुराल पुत्र सन्तान मे बढोत्तरी करती है उत्तर की ससुराल कन्या और पुत्र सन्तान को सन्तुलित रखने वाली होती है जबकि दक्षिण की ससुराल हमेशा कामी और नाम को बदनाम करने वाली सन्तान को ही देती है.
  10. शहर के उत्तर का पानी शहर को धनी बनाता है पूर्व का पानी धर्म को बढाने वाला होता है पश्चिम का पानी शहर को ऊंची इमारतो को देने वाला होता है जबकि दक्षिण का पानी शहर को डाक्टरी और तकनीकी क्षेत्र मे विकास को देने वाला होता है.
  11. ईशान की रसोई घर के मालिक को चिन्ता देने वाली होती है और किसी न किसी कारण से ग्रह स्वामी का मन जलता रहता है अग्नि की रसोई भोजन को देने वाली और घर के सदस्यों की बुद्धि को ठीक रखने वाली होती है नैऋत्य कोण की रसोई घर मे बीमारी को पैदा करने वाली और वायव्य की रसोई भोजन के मदो मे अधिक खर्च करने वाली होती है.
  12. जिस मकान की छत पर पताका स्त्रियों के पैरो में पाजेब और पुरुषों को अपने कान ढककर रखने का चलन होता है उन घरो में बुरी शक्तियां प्रवेश नही कर पाती है.
  13. छत पर शाम के समय स्त्री अगर बाल सुखा रही होती है कंघी कर रही होती है राहु उस स्त्री को मानसिक बीमारी से परेशान किये रहता है.
  14. जिस घर मे अप्राकृतिक शक्तियों का निवास होता है उस घर मे एक्वेरियम में मछलियां अधिक मरती है.
  15. रसोई मे अपने आप बर्तन गिरने लगें तो समझ लेना चाहिये कि किसी प्रकार की कलह होने वाली है यही बात दूध के उफ़न कर गिरने से भी मानी जाती है.
  16. घर मे शाकिनी स्त्री के प्रवेश के पहले ही घर के आंगन को ढक दिया जाता है.
  17. घर के नैतृत्य में रोशनदान तभी खोला जाता है जब घर मे भान्जे भतीजे या साले या मामा का निवास होना शुरु होता है.
  18. घर मे पुत्र संतान के नही होने से अक्सर कुत्ते पालने की प्रथा परिवारों मे होती है जैसे ही पुत्र संतान का आगमन होता है कुत्ता मर जाता है,लेकिन पुत्र के पैदा होने के तेरह महिने के अन्दर दूसरा कुत्ता जरूर पाल लेना चाहिये.

Saturday, June 23, 2012

जीवन में नम्बर का महत्व

जैसे हम जीवन की शुरुआत मे शब्दो को प्रयोग मे लाने के लिये अक्षरों का ज्ञान करते है वैसे ही जीवन मे गिनती करने के लिये नम्बरों को सीखते है। जीरो से लेकर नौ के अंक तक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाया हुआ है। हर  व्यक्ति एक नम्बर के आधार पर चला करता है उस नम्बर के बिना उसका जीवन अधूरा सा रहता है,कोई नम्बर भाग्य को देने वाला होता है और कोई नम्बर बहुत ही दुर्भाग्यशाली भी होता है। जन्म के नम्बर से ही पता लग जाता है कि जीवन कितने समय का है और जीवन मे किस किस वक्त कौन सी आफ़त आयेगी या जायेगी साथ ही अगर सूक्ष्म रूप से भी देखा जाये तो हर साल महिना दिन और दिन का एक एक घंटा अपनी गति को प्रदान करता है। नम्बर का जो रूप जीवन मे काम आता है वह इस प्रकार से है :-

जीवन को चलाने वाला नम्बर
जीवन जिस दिन से शुरु हुआ होता उस दिन के नम्बर से ही गति का पता लग जाता है जीवन को चलाने के लिये माता के गर्भ मे आने से ही इस नम्बर की शुरुआत हो जाती है और महिने दिन तथा घंटे से इस नम्बर का पता लगाया जाता है,पैदा होने का समय भी इसी नम्बर से प्राप्त किया जाता है।

ह्रदय की चाहत वाला नम्बर
समय समय पर मनुष्य की चाहत बदलती रहती है और जीवन मे अगर एक ही चाहत बनी रहे तो जीवन का चलना दूभर हो जाता,जब हम जन्म लेते है उसी दिन से गणना शुरु हो जाती है और इस नम्बर के लिये यह भी कहा जाता है बच्चा भी अपने दिल मे चाहत रखता है लेकिन शरीर के परिपक्वता पर आधारित होने के कारण इस नम्बर का एक प्रभाव हमारे दिल मे हमेशा रहता है अगर हमे पता लग जाये कि किस नम्बर के दिन मे हमारी चाहत बदलेगी और इस चाहत के बदलने का समय क्या होगा तो हमे काफ़ी आसानी हो सकती है.

एक नम्बर जो हमेशा मन मे रहे
कहा जाता है कि मन हमेशा चलायमान है लेकिन मन का क्षेत्र भी एक केन्द्र पर जुडा होता है जब तक केन्द्र का संचालक मन के अन्दर भाव नही भरेगा तब तक मन का चलायमान होना हो ही नही सकता है। इस नम्बर के लिये यह भी कहा जा सकता है कि जब भी कोई बात अच्छी या बुरी मन के अन्दर आयेगी उसी नम्बर के अनुसार ही आयेगी.

जन्म दिनांक
जिस दिन जातक का जन्म होता है अपनी अपनी भाषा और संस्कृति के अनुसार उस दिन का एक नम्बर भी होता है जैसे अंग्रेजी मे अगर तारीख को दिन का नम्बर मानते है तो हिन्दी मे तिथि को नम्बर के रूप मे प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार से मुसलमानी कलेण्डर मे चन्द्रमा की तारीख को ही मान दिया जाता है.वैसे दिन की मान्यता भी दी जाती है और जातक के जन्म के दिन के अनुसार ही उसका नम्बर काम मे लिया जाता है जैसे केरल मे जिस दिन व्यक्ति का जन्म होता है उसी दिन के नम्बर के अनुसार उसका फ़लादेश दिया जाता है।

मिलने वाले चेलेंज का नम्बर
जीवन मे जो भी काम करना पडता है उन सभी के लिये एक चेलेन्ज मिलता है जिस दिन काम करने का वह अच्छा हो या बुरा चेलेन्ज मिल जाता है उसी दिन से उस काम के लिये मानसिकता बन जाती है कई नम्बर तो इतने ओड होते है कि उनके लिये आजीवन एक ही प्रकार का चेलेंज स्वीकार करने के लिए व्यतीत करना पडता है।

व्यक्तिगत साल का नम्बर
हिन्दी मे हिन्दी महिनो का नम्बर और अंग्रेजी मे अंग्रेजी महिनो का नम्बर प्रयोग मे लाया जाता है। इसी प्रकार से अलग अलग देशो मे अपने अपने अनुसार महिनो की गणना के अनुसार नम्बर का प्रयोग किया जाता है। नम्बरो के आधार से ही किसी भी अल्प मध्य और उच्च गति का विश्लेषण साल के नम्बर से किया जाता है.
व्यक्तिगत महिने का नम्बर
साल के बाद महिने का नम्बर केवल शरीर की बारह गतियों पर निर्भर करता है जो गति छ: महिने पहले अच्छी थी वही गति छ: महिने बाद खराब हो जाती है जो इन गतियों को पहिचानते है वह अपने लिये पहले से ही इन्तजाम कर लेते है और वे आने वाली मुशीबत से बचकर अपने कार्य को उस मिलने वाली आफ़त से भी अपने को फ़ायदा मे ले जाते है।

व्यक्तिगत दिन का नम्बर

सूर्य का रोजाना एक अंश का मान देखा गया है चाहे साल का समय या महिने का समय एक बार गडबडा जाये लेकिन दिन का मान उतना ही रहेगा और निश्चित समय मे ही दिन का मान बदल जायेगा,यह मान अच्छे के लिये भी और बुरे के लिये भी माना जाता है। दिन के नम्बर से अक्सर रोजाना के किये जाने वाले कामो की सफ़लता असफ़लता के लिये देखा जाता है और जिस दिन का नम्बर खराब होता है या धोखा देने वाला होता है उसी के अनुसार सम्भाल लेने पर गति के अनुसार नम्बर का प्रयोग कर लिया जाता है।
जीवन की शुरुआत का नम्बर
जीवन की शुरुआत का मतलब पैदा होने से नही है जब व्यक्ति जीवन की प्रोग्रेस मे अपने को ले जाने के लिये आगे जाना शुरु होजाता है वह ही जीवन की शुरुआत मानी जाती है कभी कभी यह भी देखा गया है कि व्यक्ति पैदा होता है खाता पीता सोता जागता है और एक दिन वह चला जाता है लेकिन उसके जीवन मे किसी प्रोग्रेस का अध्याय जुड ही नही पाता है वह दूसरो के भरोसे रहकर ही पूरे जीवन को निकाल जाता है।
जीवन के परिपक्व होने का नम्बर
जीवन के तीन प्रकार माने गये है एक कच्चा जीवन होता है जिसका मान न के बराबर होता है कि कब कहां किस मोड पर जीवन जाकर रुक जाये या किस मोड पर जाकर जीवन का अन्तिम सफ़र ही पूरा हो जाये दूसरा प्रकार अल्प परिपक्व होता है जो जीवन को आगे भी चलाता है और जब चलाने के लिये शुरु हुआ जाये तो वह कार्य या व्यवहार से अपने को नेस्तनाबूद कर ले,तीसरा प्रकार वह होता है कि जीवन पूरी तरह से हर क्षेत्र की जानकारी से पूर्ण हो गया है व्यक्ति के सामने कोई भी बात अच्छी या बुरी आये वह उसे पूरी तरह से निपटाने के लिये अपने व्यवहार को सामने कर देगा इसके लिये भी एक नम्बर होता है जो निश्चित समय का बखान करता है।
अपने को प्रदर्शित करने का नम्बर
व्यक्ति को एक नाम जन्म के बाद दिया जाता है जो नाम पूरे जीवन साथ रहता है और मरने के बाद भी कुछ काल तक भी बना रहता है और मरने के कुछ समय बाद भी समाप्त हो जाता है,नाम का पहला शब्द जीवन को प्रदर्शित करने के लिये माना जाता है इस शब्द के अक्षर और उन अक्षर से बनने वाले नम्बर के बाद ही इस कारण को जाना जाता है।

किये जाने वाले कार्यों का नम्बर
जीवन मे कितने ही कार्य किये जाते है हर कार्य का एक नम्बर होता है जो नम्बर जीवन की शुरुआती हालत मे होता है उसे जीवन के कुछ क्षेत्र के लिये मानते है फ़िर आगे बढने पर दूसरा कोई नम्बर साथ हो जाता है उस नम्बर को भी देखना जरूरी हो जाता है,जितने भी कार्य जीवन मे किये जाने है वह कार्य एक सम्बन्धित नम्बर से जुडे होते है उस नम्बर के आसपास घूमने वाले नम्बरो के आधार पर गिना जाता है कि व्यक्ति कितने प्रकार के कार्य करने के लिये समर्थ है और कितने कार्य वह नही कर सकता है।

किसलिये कार्य करने है का नम्बर
कोई भी कार्य करने का एक कारण होता है और जो कारण बनता है उसका भी एक नम्बर होता है जब तक कार्य के लिये कारण नही बनेगा तब कार्य किया जाना या उसके अच्छे बुरे होने का कोई प्रभाव भी नही जाना जा सकेगा,जीवन मे अलग अलग समय जो कारण बनेगा उसके लिये भी एक नम्बर का प्रकार बनेगा लेकिन उस कारण वाले नम्बर को जानने के लिये बाकी के नम्बरो के अनुसार ही कारण का होना माना जायेगा.

दिमागी बेलेंस बैठाने का नम्बर
कार्य करने है और कारण का नम्बर नही बना है तथा कारण का नम्बर बन भी गया है लेकिन कार्य करने का बेलेन्स दिमाग मे नही बैठ पाया है तो भी काम पूरा नही हो पायेगा या तो कार्य और जीवन की एक ही दिशा बनती चलती जायेगी और दूसरी दिशा का खातमा होता चला जायेगा,हर कारण और कार्य के बीच के लिये एक बेलेन्स करने के लिये भी नम्बर की जरूरत पडती है,जो बेलेन्स दिमाग के लिये माफ़िक दिन के समय के साल के प्रभाव वाले नम्बर के साथ बेलेन्स करने से दिमागी बेलेन्स का कारण बन जाता है.

दिमाग को स्थिर रखने का नम्बर
समय काल और दूरी के नियम के अनुसार दिमाग को स्थिर रखने का भी एक नम्बर होता है जैसे समय है लेकिन काम करने का कारण नही बना है काम करने का कारण भी बना है लेकिन काम मे कठिनता आ रही है इन तीनो से तभी फ़ायदा मिलना माना जा सकता है जब दिमाग मे काम करने की स्थिरता है यह स्थिरता भी नम्बर के अनुसार ही आ पाती है।

आत्मीय नम्बर
कभी कभी देखा होगा कि किसी फ़ोन के आने से उसके साथ नया होने के बाद भी मन जुड जाता है और उस नम्बर से बात करने वाले से लगातार बात करने का मन करता है भले ही वह बात करने वाला किसी भी प्रकार से छ्ल कर दे,और कभी यह भी होता है कि कोई फ़ायदा देने वाला बात कर रहा है लेकिन उसके फ़ोन का नम्बर कुछ इस प्रकार का है कि उससे चाहते हुये भी बात नही हो पाती है आदि बाते आत्मीय नम्बर के बारे मे देखी जाती है जैसे फ़ोन का नम्बर घर का नम्बर वाहन का नम्बर और घर मे रहने वाले लोगो का नम्बर आदि.

जीवन के प्रति योजना बनाने का नम्बर
जिस समय कोई कार्य करना होता है वह चाहे घर से सम्बन्धित हो या बाहर से सम्बन्ध रखता हो वह शादी विवाह के लिये हो या किसी प्रकार के इलाज आदि के लिये किसी शिक्षा से जुडा हो या किसी प्रकार से अन्य कारण से उस समय के नम्बर पर आधारित होता है कि जो योजना कार्य के लिये बनायी जा रही है अगर वह योजना ही गलत नम्बर के समय मे बना दी गयी है तो योजना के लिये भले ही सभी साधन मिल जाये लेकिन वह योजना चाह कर भी पूरी नही होती है,यही बात अक्सर प्रेम करने वाले लोगो के लिये भी देखी जाती है प्रेम का अन्त शादी से होता है और प्रेम करने के समय से अगर शादी के समय मे फ़ेर है और बिना विचार के किये गये ही किसी गलत नम्बर के समय मे शादी की बात चलायी जाती है तो प्रेम होने के बावजूद भी शादी नही हो पाती है आदि बाते इस नम्बर से देखी जाती है।

छुपे रूप में की जाने वाली घात का नम्बर
हम अपने जीवन के प्रति सुरक्षा को लेकर चलते है और कभी कभी यह भी होता है कि हम जिस व्यक्ति से अपना सम्पर्क बना रहे होते है या जिसके ऊपर भरोसा करके चल रहे होते है वह व्यक्ति गुप्त रूप से घात करके चला जाता है या किसी प्रकार से हमने गलत नम्बर का मकान खरीद लिया है और अपनी घात का नम्बर नही पता है तो किसी न किसी प्रकार से वह मकान या वाहन हमारे लिये गुप्त रूप से हानि देने के लिये माना जायेगा चाहे वह वाहन के रूप मे एक्सीडेंट करवाये या घर के नम्बर के रूप मे आजीवन कमाने के बाद भी एक दिन डकैती डलवा दे या वह शिक्षा की शुरुआत करने के बाद ही अपनी योजना को हटाकर शिक्षा के बाद भी काम धन्धे के लिये भटकाव पैदा हो जाये.

हमेशा कष्ट देने वाला नम्बर
कई नम्बर हमारे जीवन मे ऐसे भी होते है जो बिना कारण के ही कष्ट दिया करते है,अक्सर देखा होगा कि जब हम अपने वाहन से आगे जा रहे होते है तो जिस वाहन को कष्ट देना वह किसी भी तरह से आगे जाने की प्रतिस्पर्धा मे सामने आने की कोशिश करेगा,या यह भी देखा होगा कि मकान का नम्बर अगर सही नही है तो गलत नम्बर वाला पडौसी बेकार मे ही परेशान करने लगेगा या कोई फ़ोन का नम्बर ही बेकार मे ही परेशान करने के लिये अपनी काल करने लगेगा आदि इस नम्बर को पहिचान कर पता की जाती है.

Thursday, May 17, 2012

विशेषज्ञ की राय (एक कानूनी पहलू)

अन्जान स्थान पर जाते समय रास्ता पूंछना जरूरी होता है,जाने वाले स्थान पर पहुंचने के लिये हम अपने अनुभव के अनुसार साधनो का प्रयोग करते है,जितना अच्छा अनुभव होता है उतनी जल्दी हम अपने गन्तव्य पर पहुंचते है,जितनी अज्ञानता होती है उतनी ही देर हमे गन्तव्य पर पहुंचने मे लगती है। अन्जान रास्ते पर जाते समय आशंकाये मन मे रहती है,कौन सा रास्ता होगा कौन सी मोड आयेगी कौन कौन से खतरे के कारण रास्ते मे आ सकते है,सुरक्षित पहुंचने के लिये कौन सा उपाय सही काम करेगा आदि बाते सामने आती है। गाइड का काम करने वाले इसी प्रकार की सलाह से अपने जीवन यापन को करते है। लेकिन जरूरी नही है कि हमे हमारे जाने वाले रास्ते के लिये गाइड मिल ही जाये,हमे उपयोग करने वाले रास्ते के लिये स्थानीय मदद भी लेनी पडती है। स्थानीय मदद मे उस स्थान के बारे मे सभी कुछ जानने वाले लोगो की मदद ली जाती है। जैसे किसी विशेष स्थान पर जाते समय चौराहे के पान वाले से पूंछा जाता है,वह जैसा भी उत्तर देता है उसी के निर्देशानुसार रास्ता प्रयोग किया जाता है,जितने समय तक रास्ता तय किया जाता है पान वाले की बातो पर ध्यान रखकर चलना पडता है,ध्यान केवल इसलिये रखना पडता है क्योंकि हमे गन्तव्य पर पहुंचना होता है और बताने वाला एक पान वाला होता है,पान वाले से हमारी कोई जान पहिचान नही होती है,फ़िर भी हम उसकी बात का विश्वास करने के बाद चलते है।गन्तव्य पर अगर हम सही सलामत पान वाले की राय से पहुंच जाते है तो हमारे मन मे उस पान वाले के प्रति विश्वास और अधिक गहरा हो जाता है,और हम किसी प्रकार से गन्तव्य पर नही पहु़ंच पाते है तो उस पान वाले के प्रति एक दुर्भावना मन के अन्दर पैदा हो जाती है उसने गलत रास्ता बता दिया था इसलिये समय पर गन्तव्य पर नही पहुंच पाये। सूक्ष्म रूप से अगर इस बात को देखा जाये तो भले ही हमने जब गन्तव्य स्थान का रास्ता पूंछा था उस समय कोई पूंछने मे गल्ती की हो लेकिन दोष उस पान वाले पर चला गया कि रास्ता उसने गलत बताया था। जब दिमाग मे गहराई से सोचा तो पता लगा कि हमने ही उस पान वाले से गलत रूप मे पूंछा था जिससे उसने बताई जाने वाली रास्ता गलत बताई थी। पान वाले ने राय देते समय कोई राय देने की कीमत नही बताई थी,हमने राय लेने के लिये कोई कीमत नही चुकाई थी,अगर पान वाला दोषी है तो उसे दण्ड भी नही मिलना चाहिये और हमने अगर कीमत नही चुकाई है तो हमे अपने मन से पान वाले के दोषी होने का ख्याल नही रखना चाहिये प्रकृति यही कहती है। हमारे जीवन मे दूसरो की दया का होना जरूरी है हर दया की कीमत चुकाना हमारे वश की बात भी नही है,कितनी ही कोशिश की जाये कि हम किसी भी व्यक्ति की दया नही ले,लेकिन बिना दया के लिये हमारा जीवन रुक जायेगा,हमे जहां पहुंचना है वहां हम पहुंच ही नही पायेंगे चाहे वह शरीर के विकास से जुडा रूप हो या ज्ञान की सीमा मे आने वाला क्षेत्र हो,जो भी दया हमे मिलती है वह प्रकृति की दी जाने वाली दया होती है,जैसे हमे धूप से गर्मी रोशनी हवा से सांस लेना पानी से प्यास बुझाना प्रकृति की दी गयी वस्तुओ से अपनी भूख को समाप्त करना आदि।
प्रकृति देती है दया
प्रकृति का नियम है कि वह अपने द्वारा पैदा करने वाले जीव को अपनी दया देती है। उस दया को हम ससम्मान ग्रहण भी करते है लेकिन कुछ मायनो मे हम उसी दया को अधिक मूल्य देते है जो दया हमने खरीद कर प्राप्त की हो,यह हमारे प्रयास और हमारी मेहनत से मिलने वाली दया का रूप होता है जैसे गर्म पानी को ठंडा करने के लिये हमने मशीन को खरीदा और पानी को ठंडा करने के बाद उसे प्रयोग मे लिया तो वह पानी रूप की दया तो प्रकृति की थी लेकिन उस पानी की तासीर बदलने की क्रिया को हमने अपनी क्रिया के अनुरूप बना लिया और हमने घमंड कर लिया कि पानी को हमने ठंडा किया है। हम पानी को कीमत लगाकर बेचना शुरु कर देंगे,उसी पानी को साफ़ करने के बाद उसे एक रूप देकर उसका मूल्य प्राप्त करने लगेंगे और प्रकृति की दी जाने वाली दया को हम बेच कर अपने जीवन को आगे बढाने की कोशिश करने लगेंगे। लेकिन सोचना हमे यह चाहिये कि पानी अगर प्रकृति ने नही दिया होता तो हम पानी को ठंडा भी नही कर सकते थे पानी को साफ़ भी नही कर सकते थे,पानी पर हम अधिकार भी नही जमा सकते थे। यह बात दया को खरीदने बेचने की क्रिया के अन्दर शामिल कर लिया गया और उसे अगर हमारे पास अधिक पानी है तो हमे पानी का मालिक बना दिया गया और उस पानी को अगर कोई दूसरा प्रयोग मे लाता है तो उसकी कीमत वह चुकाकर या हमारी दया के आधीन होकर वह पानी को प्रयोग मे लाता है वहां पर हम और वह प्रयोग करने वाला यह भूल जाता है कि पानी तो प्रकृति ने दिया है। फ़िर एक दूसरे की दया और कीमत का प्रयोग करना ही बेकार की बात है।
राय लेने की कीमत और उसका महत्व
माँ बच्चे को राय बिना कीमत के देती है पिता अपने पुत्र को बिना किसी कीमत के पालन पोषण करता है,परिवार के लोग भाई बहिन आदि सभी बिना कीमत के आगे बढने की राय को देते है। लेकिन जैसे ही शिक्षा के क्षेत्र मे प्रवेश किया जाता है वैसे ही अजनबी लोगो की श्रेणी शुरु हो जाती है और मिलने वाली सांसारिक शिक्षा के लिये फ़ीस के रूप मे कीमत चुकाना जरूरी हो जाता है। इस रूप मे जो कीमत दी जाती है वह दी जाने वाली शिक्षा की श्रेणी के अनुसार होती है,भले ही विद्यार्थी मे ग्रहण करने की शक्ति नही हो लेकिन उसे कीमत तो चुकानी पडती है,कारण कीमत चुकाना कानूनी अधिकार मे आजाता है और कीमत नही चुकाई गयी तो शिक्षा की श्रेणी मे आगे नही बढने दिया जायेगा। यहां पर दया का रूप समाप्त हो जाता है उस रूप के समाप्त होने का कारण भी है कि हम अपने अनुसार यह व्यक्त करना चाहते है कि अजनबी जो शिक्षा को दे रहा है वह उस शिक्षा की बदौलत अपने जीवन के निर्वाह को कर रहा है। लेकिन हम जो उस शिक्षा से प्राप्त कर रहे है या ग्रहण कर रहे है उसके अन्दर कीमत लेकर शिक्षा उचित रूप मे नही देने के कारण शिक्षा को देने वाला दोषी नही माना जाता है वहां पर दोष हमे दिया जाता है और परीक्षा के रूप मे हमे पास या फ़ेल कर दिया जाता है। अगर कानून यह कहता है कि अजनबी व्यक्ति से शिक्षा लेने के लिये कीमत चुकानी पडेगी तो कानून को यह भी कहना चाहिये शिक्षा के लिये जो कीमत ले रहा है उसे उसी श्रेणी की शिक्षा उसी कीमत मे प्रदान भी करनी चाहिये ? कानून यहां पर चुप हो जाता है इसका कारण है कि कानून हमे दोषी बना देता है कि हमारे अन्दर जितनी शिक्षा दी जाती है उसे ग्रहण करने की शक्ति नही है ? जब ग्रहण करने की शक्ति में समानता नही है तो कानून को भी समान भाव से नही देखना चाहिये ? अथवा कानून मे भी समानता का रूप नही होना चाहिये ? कानून को भी राय देने के मामले मे एक ही प्रकार का कारण प्रयोग मे नही लाना चाहिये। यह नही हो सकता है अगर एक व्यक्ति के लिये एक कानून बनेगा तो संसार मे अरबो खरबो कानून बन जायेंगे आदमी का कानून से चलना दूभर हो जायेगा? जब माँ अपने बच्चे को मुफ़्त मे पालन पोषण करती है पिता बच्चे को मुफ़्त मे धन आदि की सहायता देकर समर्थ होने तक अपनी शक्ति को व्यय करता है,पत्नी मुफ़्त मे बच्चे पैदा करने के बाद परिवार को आगे बढाने के लिये आगे आती है तो इसकी कीमत भी कानून के द्वारा चुकानी जरूरी होनी चाहिये ? ऐसा नही होता है क्योंकि यह प्रकृति के कानून के अन्दर आजाता है और यह सब दया पर निर्भर होता है,यह दया मर्सी आफ़ गाड कहलाती है,इस मर्सी को प्रयोग करने के लिये हम सब स्वतंत्र है,भले ही बच्चे को पालने पोषने के बाद बच्चा माता पिता को छोड कर चला जाये,भले ही बच्चे को पैदा करने के बाद माता पिता उसे कचरे के डिब्बे मे डाल आयें,यहां कानून काम करने लगेगा।
राय मशविरा और कानून का दायरा
रास्ता बताने के लिये पान की दुकान वाला जिम्मेदार नही है वह रास्ता बताता है तो उसकी मर्जी है नही बताता है तो उसकी मर्जी है,उसे कानून परेशान नही करेगा। भिखारी को भोजन देना हमारी मर्जी पर निर्भर है हम भिखारी को भोजन दे भी सकते है और नही भी दे सकते है यहां कानून हमे भिखारी को भोजन देने के लिये परेशान नही करेगा। जब हम मुशीबत मे आजायें तब हम जो राय लेंगे वह राय कीमत मे बदल जायेगी। शरीर की तकलीफ़ की राय लेने के लिये डाक्टर को कीमत चुकानी पडेगी,भले ही डाक्टर की राय गलत हो जाये,डाक्टर को कीमत चुकाने के बाद भी डाक्टर को कोई दंड नही झेलना होगा,कारण वह अपनी बचाव की प्रक्रिया मे उसी कारण को पेश करेगा जो कारण सभी तरह से मान्य हो,मेडिकल कानून से जुडा हो। डाक्टर की राय कीमती इसलिये भी हो जायेगी क्योंकि उसने डाक्टरी की पढाई की है,उसे डिग्री देने के वक्त यह मान लिया जाता है कि उसे सभी प्रकार का सम्बन्धित क्षेत्र मे ज्ञान प्राप्त हो चुका है,भले ही शाम को डाक्टर ने अधिक शराब पी ली हो और वह सुबह को उसने अपने बन्द दिमाग से गलत राय दे दी हो,डिग्री धारक होने से कानून उसके पिछले कारको नही देखकर और दिमाग का मुआयना नही करवा पायेगा। उसने जो राय दी है वह ही मान्य होगी भले ही मरीज का ऊपर जाना निश्चित हो चुका हो ? सभी बोझ दवा कम्पनी पर डाल दिया जायेगा मरीज के भोजन और रहन सहन पर डाल दिया जायेगा,दूध की जगह पर छाछ पीकर मरजाना बता दिया जायेगा आदि। एक साधारण आदमी अगर अपने जीवन मे उचित मात्रा मे उसी शिक्षा को प्राप्त करने के बाद मरीज को बचाने के लिये आगे आयेगा तो उसे कानून यह कहकर काम नही करने देगा कि उसके पास डिग्री नही है,वह राय देने के काबिल नही है। पान वाले को नही डिग्री नही दी गयी है तो वह रास्ता बता सकता है,दूध वाले को डिग्री नही दी गयी है वह दूध को पानी मे या पानी को दूध मे मिलाकर बेच सकता है बूट पालिस करने वाले को डिग्री नही दी गयी है,सडक पर कचरा बीनने वाले को डिग्री नही दी गयी है रिक्सा चलाने वाले को वजन ढोने वाले को बर्तन साफ़ करने वाले को व्यापार करने वाले को फ़ैक्टरी लगाने वाले को किसान को मजदूर को मिस्त्री को पत्थर तोडने वाले को मन्दिर के पुजारी को पूजा करने वाले को किसी को भी डिग्री नही दी गयी है यह सब बिना डिग्री के काम कर सकते है ?

Thursday, April 26, 2012

शिरडी की माटी (भाग 5)

सूर्य और चन्द्रमा के लिये केवल शनि ही पल्ले पडा है। जैसे कर्क और सिंह के सप्तम के स्वामी शनि होता है एक सकारात्मक होता है एक नकारात्मक होता है वैसे ही शनि की दोनो राशियों के लिये भी सूर्य और चन्द्रमा ही सप्तम के स्वामी भी होते है और सकारात्मक और नकारात्मक का प्रभाव देते है। चन्द्रमा का रूप जब शनि की राशि मकर से सप्तम का होता है तो वह केवल सोच को पैदा करने के लिये ही अपना फ़ल देता है तथा सप्तम का स्वामी जिस भाव मे होता है उसी भाव का फ़ल भी प्रदान करता है। राशि भी अपना फ़ल प्रदान करती है और सप्तम के स्वामी पर जो भी ग्रह अपनी नजर देते है उन ग्रहों का असर भी सप्तम के स्वामी पर पडता है आगे पीछे के ग्रहो का प्रभाव भी बहुत अदर देता है इसके अलावा एक सिद्धान्त भी है कि राहु से आगे जो भी ग्रह होता उसे राहु के लिये खर्च करना पडता है और राहु से जो ग्रह बारहवा होता है उसके लिये राहु खर्च करता है। लेकिन जो ग्रह राहु के बारहवे होते हुये भी बक्री होता है वह राहु से न लेकर राहु को देने के लिये माना जाता है। धर्म और रोजाना के कार्यों का मालिक बुध है जो बक्री होकर सप्तम मे विराजमान है,जिन कारको के लिये इस ग्रह का प्रभाव देखा जायेगा वह राहु के लिये खर्च करने वाला माना जायेगा। शनि राहु जब एक जगह पर स्थापित हो जाये तो काली मिट्टी की आन्धी की तरह अपना असर प्रदान करते है। यह असर शनि की द्रिष्टि से भी देखा जायेगा और राहु की द्रिष्टि से भी देखा जायेगा। कुन्डली मे धर्म और भाग्य का कारक ग्रह बुध है बुध के वक्री होने का मतलब है कि जो भी भाग्य से सम्बन्धित बाते है धर्म से सम्बन्धित बाते है वह खुद न करके दूसरो के लिये करना,जब कोई बात खुद के लिये प्रयोग नही की जाती है तो यह माना जाता है कि जो लोग खुद तो मन्दिर मे रहते है और दूसरो के लिये पूजा पाठ धर्म कर्म आदि करवाते उनके लिये भाग्य केवल उतना ही काम करता है जितने से वह अपना पेट भर सकते है और अपने परिवार की गाडी धीमी गति से चलाते रहते अगर यह बुध राहु जैसे चालाक ग्रह एक साथ हो जाता तो उन्ही लोगो की तरह से हो जाता जो लोग अपने जीवन मे तो दुखी होते ही और और दूसरे को भी अपनी चालाकी से झूठ बोलकर दुखी करने के लिये माने जाते है। यह बात इस कुंडली से नही मिलती है। यह भी कहा जाता है कि राहु जब अष्टम मे होता है तो गूध ग्यान का कारक भी बन जाता है लेकिन जातक का गुरु अगर राहु के घेरे मे आजाता है तो वह अपने गूढ ग्यान को प्राप्त करने के चक्कर मे अपनी खुद की औकात को राख बना डालता है लेकिन इस राहु के घेरे मे अगर शनि आजाता है तो जातक अपने गूढ ग्यान से लोगो के जीवन मे एक प्रकार से रोशनी कर जाता है। राहु अपनी बुद्धि से अपनी गूढता को केतु को देता है और केतु को बल लेने के लिये अपने परिवार के बडे लोगो की हैसियत पर निर्भर रहना पडता है। इस बात को भी उपरोक्त कुंडली के अनुसार माना जा सकता है। इस कुंडली का मुख्य ग्रह शनि है जिसने अपने बल से सूर्य को भी घेरे मे ले रखा है इस कारण से जीवन साथी का व्यवहार अपने खुद के परिवार से सही नही रहना माना जाता है बुध वक्री से युति लेने के कारण जो भी कार्य होते है उन कार्यों मे खुद की मानसिक स्थिति से बार बार बदलने वाली पोजीशन भी मानी जाती है अक्सर यही मन मे लगा रहता है कि अमुक अपने काम को करने के बाद कितना आगे बढ गया है और वह अपने कार्यों को करने के बाद भी आगे नही बढ पा रहा है इस प्रकार को अधिक असरकारक करने के लिये शनि का प्रभाव जब जन्म के चन्द्रमा पर भी जाने लगता है तो जातक अपने बनाये प्लान कभी भी सफ़ल नही कर पाता है अगर वह अपने काम रास्ता चलते करने लग जाता है तो उसके सभी काम बडी आसानी से पूरे हो जाते है। सप्तमेश का धर्म भाव मे होना तथा इस भाव का कालेज शिक्षा आदि से भी सम्बन्ध रखना माना जाता है इस मे सूर्य की युति शनि से होने के कारण बहुत मेहनत करने के बाद यानी भटकाव के बाद ही सरकार की कृपा मिल पाती है। ऐसा भी होता है कि जब लोग बहुत ही परेशान हो जाते है और थकर बैठ जाते है तो यह शनि चन्द्र सूर्य का सहारा लेकर अपनी शक्ति को दे देता है और जातक अपने जीवन पीछे किये गये परिश्रम के आधार पर आगे बढ जाता है। वर्तमान मे गुरु का गोचर चौथे भाव मे होने से और गुरु का योगात्मक प्रभाव अष्टम के शनि से होने के कारण अक्सर जातिका ठगी का शिकार भी हो जाती है कारण गुरु जब अष्टम शनि राहु के घेरे मे आजाता है तो धन की और घर की बातो मे दिक्कत का आना हो जाता है यही बात सन्तान के मामले मे भी मानी जाती है कारण शनि का प्रभाव भी धार्मिक रूप से लेकिन राहु का रूप पूर्ण रूप से मिलने के कारण जातिका आगे अपने कार्यों मे सरलता से सफ़ल हो जाती है। 

Sunday, April 22, 2012

चौसठिया कौडी

पुराने जमाने मे मुद्रा के चलन मे नही होने पर कौडी का प्रयोग किया जाता था और वस्तुओ की खरीददारी आदि कौडी से की जाती थी,कौडी से गिनती की क्रिया भी पूरी की जाती थी तथा कौडी के अनुसार ही एक दूसरे को सन्देश भेजने की क्रिया की जाती थी। आज भी एक कहावत बडे रूप से कही जाती है कि "दो कौडी की औकात है" या कौडी की औकात नही है फ़िर भी आगे आगे फ़िरने की कोशिश करते हो। कौडी समुद्र और नदियों मे पायी जाती है। सबसे उत्तम समुद्र की कौडी मानी जाती है,तथा नर्मदा के समुद्र मे मिलने के स्थान की कौडी भारी भी होती है और काम की भी मानी जाती है। कौडी का प्रयोग बुध ग्रह के तंत्रो मे किया जाता है। जब बुध ग्रह परेशान करने लगता है तो लोग कौडी को उपाय के रूप मे प्रयोग करते है,तांत्रिक लोग बिना कौडी के कभी तंत्र विद्या का प्रयोग नही करते है। बुध कमन्यूकेशन का ग्रह है जब भी लोग अन्जान लोगो से मुलाकात करने जाते है सिद्ध कौडी को अपने साथ ले जाते है,शमशानी क्रियाओं मे भी कौडी का इस्तेमाल किया जाता है। जहां शिव लिंग पर भस्म का प्रयोग किया जाता है वहां कौडी की भस्म अपनी मान्यता अलग ही रखती है,कई बार कौडी को सजाने के काम मे भी लिया जाता है और इसे मंत्र से अभिषिक्त करने के बाद लोग अपने घर मे भी रखते है भारत मे कई जातिया कौडी को अभिमंत्रित करने या करवाने के बाद बच्चो और पशुओं के गले मे भी बांधते है,कौडी का प्रयोग जुआ आदि खेलने के काम भी लिया जाता है जहां चित्त पट्ट कौडी के रूप मे हार जीत का फ़ैसला किया जाता है,जैसे चार कौडी को उछाला गया और चारो ही पट्ट पड गयी तो बडी जीत या बडी हार मानी जाती है वैसे ही एक दो तीन आदि के लिये भी माना जाता है। चौपड खेल मे कौडी का बहुत महत्व है यह रजबाडो के जमाने मे खेला जाता था तथा आज भी कहीं कहीं चंगा पो नामक खेल खेला जाता है।

कौडियों मे चौसठिया कौडी की अधिक मान्यता है यह अधिकतर समुद्र मे ही मिलती है और गहरे सरोवरो मे भी कभी कभी मिल जाती है।इस कौडी का रूप भी बडा होता है और यह अक्सर दीपावली ग्रहण आदि के समय लोगो की तिजोरियों से बाहर आती है,अन्यथा यह अद्रश्य ही रहती है,किसी को भाग्य से यह किसी समुद्री आइटम बेचने वाले की दुकान पर मिल जाये तो भाग्य वाली बात भी मानी जाती है.

इस कोडी का प्रयोग लोग अपने व्यवसाय स्थान मे बिक्री आदि के बढाने के लिये रखते है किसी खतरनाक काम को करने के लिये यह अपने साथ जेब मे रखकर ले जायी जाती है,अक्सर बीमारी की अवस्था मे इसे सिरहाने रखा जाता है। चौसठिया का रूप अक्सर व्याधि नजर तंत्र आदि को खाने के लिये माना जाता है,इस कौडी की विशेषता होती है कि किसी भी कमरे आदि मे खुले मे रखने के बाद जब इसे साफ़ पानी से धोया जाता है तो इसके अन्दर से पीले रंग का पानी निकलता है साथ ही जब किसी बन्द बक्से और तिजोरी आदि मे रखा जाता है तो धोने पर पानी का रंग कालिमा लिये होता है,बीमारी की अवस्था मे सिरहाने रखने के बाद धोने पर इसके धोने का पानी हल्की लालिमा लिये होता है,कोई दोष नही होने पर यह साफ़ पानी ही दिखाती है।

Friday, April 20, 2012

कल था वह आज नही,आज है वह कल नही !

बचपन मे धरती के घूमने का सिद्धान्त पढा था,जब तक इस सिद्धान्त को नही पढा था तब तक यही बात दिमाग मे रहा करती थी कि सूर्य और तारे घूम रहे है धरती अपने स्थान पर स्थिर है,लेकिन जब पता चला कि धरती भी घूम रही है और सितारे भी घूम रहे है,सूर्य अपने स्थान पर स्थिर है,बहुत बडा अचम्भा हुआ था,कि वाह ! जो सूर्य कल तक हमारे चारो ओर घूम रहा था,आज पता लगा कि हम ही सूर्य के चारो ओर घूम रहे है,खैर यह बचपन की बातें थी,जो बचपन मे था वह आज नही है आज है वह कल नही रहेगा।

एक ज्योतिषी जी पास मे बैठे थे किसी व्यक्ति को ज्ञान दे रहे थे,तुम्हारा जन्म से सूर्य खराब है इस सूर्य की आराधना कर लो और सूर्य का रत्न पहिन लो फ़िर तुम्हारी जिन्दगी सही चल उठेगी। उनकी बात पर अचम्भा भी हुआ और मन ही मन हंसी भी आयी,सूर्य यानी पिता ने अपने कर्तव्य को पूरा नही किया होता तो यह शरीर नही होता और शरीर का पालन पोषण उनके द्वारा नही हुआ होता शिक्षा दीक्षा नही दी गयी होती तो यह शरीर आज इस लायक ही नही था कि वह व्यक्ति ज्योतिषी जी तक पहुंच पाता,यह तो बात दुनियादारी से सोचने के लिये है इसी प्रकार से जब व्यक्तिगत रूप से सोची जाये तो शरीर में तकलीफ़ है हड्डियों मे बीमारी है क्षरण होने लगा है चेहरे पर दाग बन गये है सरकार से परेशानी होने लगी है पिता बीमार है लोग उल्टी सीधी बाते करने लगे है घर के अन्दर ही राजनीति बनने लगी है,हर बात पर घर मे तू तू मै मै होने लगी है,बाते अधिक और काम कम होने लगा है हर बात पर तर्क किया जाने लगा है,आंखो की रोशनी कम होने लगी है चशमा भी कम पडने लगा है तो माना जा सकता है कि सूर्य को खराब कर लिया गया है सूर्य खराब नही हुआ है,नमक अधिक खाया होगा स्त्री संगति अधिक की होगी गलत लोगो की संगतिमे आकर गलत स्त्री संगति की होगी पिता को शराब कबाब और उल्टी सीधी बातो से परेशान किया होगा जिससे वह चिन्ता मे चले गये और बीमार हो गये घर के लोगो के लिये उल्टा सीधा पैसा लाकर दिया होगा जिससे वह हराम खाऊ हो गये और जब नही मिल रहा है तो आपस मे ही लडने झगडने लगे है खुद ने भी चिन्ता मे रहकर भोजन और नीन्द से दूरी बना ली होगी इसलिये आंखो की रोशनी पर फ़र्क पडने लगा होगा अगर इन्ही बातो पर ध्यान दिया जाता तो सूर्य खराब क्यों होता। रोजाना व्यायाम किया जाये रोजाना के काम पूरी लगन से पूरे किये जाये कोई भी काम करने से पहले उसे सोचा जाये जिस भोजन से पाचन क्रिया सही रहे उस भोजन को नियम से लिया जाये स्त्री संगति को कन्ट्रोल मे रखा जाये गलत लोगो की संगति को त्याग दिया जाये,रात की नींद पूरी की जाये तो अपने आप ही शरीर का सूर्य सम्भल जायेगा,यह सब होना नही तो ज्योतिषी तो क्या भले ही जिन परमपिता परमात्मा ने इस जमीन पर भेजा है वह भी आ जायें तो भी कुछ नही होने वाला है। सूर्य राजनीति है और यह सभी के पास मौजूद है अच्छे के लिये अच्छा देखेगी और बुरे के लिये बुरा देखेगी जो सूर्य की रोशनी मे रहकर कार्य किया जाता है वह सभी के सामने होता है जो गुप्त रूप से किया जाता है उस पर तो सभी अपना अपना अन्दाज लगायेंगे कोई सही अन्दाज भी लगा सकता है कोई गलत अन्दाज भी लगा सकता है और जब गलत और सही अन्दाज लगाने की नीति मे फ़ंसना होगा तो बुरा भी लग सकता है भला भी लग सकता है,पुराने जमाने मे केवल अन्दाज कुछ लोगो तक ही सीमित रहता था आज के जमाने मे अभी करो थोडी देर मे संसार को पता लग जायेगा। तो वही काम करो जो लोगो के लिये फ़ायदा देने वाले हो वही कमाई करो जो शाम को नीन्द भी अच्छी दे और भूख भी खूब लगाये,जो सन्तान और घर के लोग है वे भी समझे कि घर मे जो आ रहा है वह मेहनत करने के बाद और सच्चे रूप से आ रहा है उन्हे भी कोई गलत लत नही लगेगी,राजनीति भी नही होगी,सच्चे को लोग सच्चा ही कहेंगे अपने आप सूर्य काम करने लग जायेगा। जो कल था वह आज नही है और जो आज है वह कल नही रहेगा।

चन्द्रमा खराब होने की निशानी होती है कि मन की सोच बदल जाती है झूथ बोलना आजाता है,चलता हुआ रास्ता भूला जाता है माता बीमार रहने लगती है जुकाम और ह्रदय वाली बीमारिया शुरु हो जाती है वाहन जो भी पास मे है सभी किसी न किसी कारण से बन्द हो जाते है बडी या छोटी बहिन भी दिक्कत मे आजाती है घर मे पानी मे कही न कही से गन्दगी पैदा हो जाती है भोजन करते समय पसीना अधिक निकलने लगता है किसी भी काम को करते समय खांसी आने लगती है गले मे ठसका लगने लगता है चावल को मशाले वाले पदार्थो मे मिलाकर खाने का जी करने लगता है। घर मे कन्या संतति की बढोत्तरी होने लगती है,कोई बहिन बुआ बेटी विधवा जैसा जीवन जीने लगती है,पडौसी नाली के लिये और घर मे आने वाली पानी के लिये लडने लगते है,मूत्र रोग पैदा हो जाते है,घर मे सुबह शाम की सफ़ाई भी नही हो पाती है,पानी का सदुपयोग नही किया जाता है घर मे पानी का साधन खुले मे नही होकर अन्धेरे मे कर दिया जाता है,पानी को बेवजह बहाना शुरु कर दिया जाता है,लान मे लगी घास सूख जाती है अधिक पानी वाले पेड नही पनप पाते  है घर के एक्वेरियम मे मछलिया जल्दी जल्दी मरने लगती है,जुकाम वाले रोगो से पीडा होने पर सिर हमेशा तमकता रहता है अच्छे काम को करने के समय भी बुरा काम अपने आप हो जाता है मन की गति कन्ट्रोल नही होने पर एक्सीडेन्ट हो जाता है पुलिस और कानूनी क्षेत्र का दायरा बढने लगता है घर के अन्दर दवाइयों का अम्बार लगने लगता है। आंखो से अपने आप ही आंसू आने लगते है,आसपास के लोग तरह तरह की बाते करने लगते है हितू नातेदार रिस्तेदार सभी कुछ न कुछ कहते हुये सुने जाते है जिन लोगो के साथ अच्छा काम किया है वह भी अपनी जीभ से उसे उल्टा बताने लगते है जो अधिक चाहने वाले होते है उनके अन्दर भी बुराइया आने लगती है आदि बाते देखने को मिलती है।ज्योतिषी जी से पूंछो तो वह कहने लगेंगे कि मोती की माला पहिन लो चन्द्र मणि को पहिन लो चांदी को पहिन लो चांदी को दान मे दे दो,चन्द्रमा के जाप कर लो,यह सब खूब करो लेकिन जो कल किया है उसे आज भुगतने के लिये ज्योतिषी जी अपने सामान के साथ सहायता नही दे पायेंगे,कितने ही मंत्र बोल लो लेकिन मंत्र भी तब तक काम नही करेगा जब तक चित्त वृत्ति सही काम नही करेगी,घर मे रखी चांदी को या खरीद कर दान मे देने से किसी और का भला हो सकता है बिना चित्त वृत्ति बदले खुद का भला तो हो नही सकता है,मोती की माला भी तभी काम करेगी जब चित्त वृत्ति बदलेगी,अगर आज से चित्त वृत्तिको बदलने की हिम्मत है तो कल अपने आप ही सही होने लगेगा नही मानो तो अंजवा कर देख लो। चन्द्रमा का काम तुरत फ़ल देना होता है वह आज धन के भाव मे रहकर धन को देगा लेकिन जैसे ही वह खर्चे के भाव मे जायेगा तो धन को खर्च भी करवा लेगा,जो भी कारक उसके साथ होगा उसी के अनुसार वैसे ही काम करने लगेगा जैसे पानी मे मिठाई मिला दो तो मिठाई जैसा काम करने लगेगा गर्मी मे रख तो गर्म हो जायेगा फ़्रिज मे रख तो ठंडा हो जायेगा,मिर्ची मिला तो कडवा हो जायेगा जहर मिला तो जहरीला हो जायेगा,लेकिन चित्त वृति नही बदलती है तो वह जहरीला पानी मार सकता है और चित्त वृत्ति बदली है तो वह किसी जहरीले जानवर के काटने पर उसे बचा भी सकता है,मिर्ची वाला पानी सब्जी मे दाल मे भोजन के काम आ सकता है गर्म पानी चाय मे काम आ सकता है और ठंडा पानी शर्बत मे काम आ सकता है,लेकिन यह सब होगा तभी जब चित्त वृत्ति को बदल लो,बिना चित्त वृत्ति को बदले कुछ भी नही हो सकता है। चन्द्रमा भावुकता कारक है,अधिक भावना मे आकर यह रोना भी शुरु कर देता है और जब प्रहसन पर आये तो हँसना भी चालू कर देता है,जब गम की श्रेणी मे आजाये तो अकेला बैठ कर सोचने के लिये भी मजबूर कर सकता है,डरने की कारकता मे चला जाये तो थरथर कांपने भी लगता है। यह सब कारण अच्छी और बुरी भावना को साथ लेकर चलने से ही होता है,अन्यथा नही होता है।जब मन के अन्दर बदले की भावना नही पैदा होगी तो किसी से बैर भाव भी नही होगा और जब बैर भाव नही होगा तो लोग अच्छा ही सोचेंगे जो मन की भावनाये है उनका अच्छा और बुरा रूप दोनो सोच कर निकालेंगे तो हो ही नही सकता है कि कोई बुराई मान ले। लेकिन यह भी ध्यान रखना है कि फ़ूल और तलवार का रूप भी दिमाग से समझना पडेगा अन्यथा तलवार का काम काटना होता है और फ़ूल का काम सुन्दर भावना को देना होता है,कसाई तलवार की भाषा को समझता है और सन्त फ़ूल की भावना को समझता है।जैसे ही मन की भावना बदली मोती की माला भी काम करने लगेगी,लोगो को एक गिलास पानी पिलाने से भी चांदी के दान से बडा फ़ल मिलने लगेगा,एक सफ़ेद कपडा पहिनने से भी चन्द्रमणि का फ़ल मिलने लगेगा। यह सब कल की बुराई को आज निकालने पर कल अच्छाई से ही मुकाबला होगा इसमे कोई दोराहा नही है,नही मानो तो अंजवा कर देख लो।

शिरडी की माटी (भाग 4)

एक कहावत है कि जो समय आज और अभी है उसे कभी प्राप्त नही किया जा सकता है। उसका प्रभाव रूप और शक्ति का परिवर्तित रूप ही आगे प्राप्त होगा,बिलकुल वैसा तो कभी प्राप्त नही हो सकता है। ज्योतिष का एक नियम और भी है जो किसी भी प्रकार से हर समय हर जगह और हर प्रकार से प्रयोग मे लाया जाता है वह होता है जब सूर्य देखता है तो चन्द्र सोचता है और देखने और सोचने की क्रिया को भौतिक रूप मे बदलने के लिये शनि अपने कार्य को करता है,बाकी के ग्रह नक्षत्र योग संयोग सभी अपने अपने अनुसार सहायक शक्तियों के रूप मे देखे जाते है। ऊपर दो कुंडली आपके सामने है एक कुंडली शिरडी की प्राचीन आत्मा की है और दूसरी शिरडी की एक दूसरी आत्मा की है। दोनो के पैदा होने की लगन एक ही है समय बदल गया है,पहली कुंडली मे चन्द्रमा लगन मे ही विराजमान है दूसरे मे चन्द्रमा ग्यारहवे भाव मे विराजमान है,पहले मे सूर्य की स्थिति कार्य भाव मे है और दूसरे के सूर्य की स्थिति धन भाव मे है,पहली कुंडली मे शनि की स्थिति बारहवे भाव मे है और दूसरे की स्थिति छठे भाव मे है,यह क्रिया देखने सोचने और करने के लिये मानी जा सकती है। इसी प्रकार से बाकी की शक्तियां जो सहायक शक्तियों के रूप मे काम करने वाली है,वे अपने अपने अनुसार कार्य मे है।
  • धनु राशि का मूल्य समझने के लिये पहले धर्म का मूल्य समझना पडेगा,मेष सिंह और धनु धर्म की राशिया है,धर्म का मतलब कोई पूजा पाठ तीर्थ यात्रा या संस्कार से ही नही माना जाता है धर्म का मुख्य रूप समाज मर्यादा कानून न्याय स्थान और स्थान के इतिहास से माना जाता है,धनु लगन मे पैदा होने वाला जातक उपरोक्त कारणो मे ही अपने जीवन को लेकर चलता है.इस राशि वाले जोखिम को लेकर ही आगे बढने वाले होते है,वह जोखिम पहली कुंडली के अनुसार बारहवे शनि को देखने से पैदा होने वाले स्थान को छोड कर शमशानी स्थान जिसे वीराना भी बोलते है,मे जाकर अपनी स्थिति को दर्शाने के लिये अपनी योग्यता को जाहिर करता है तो दूसरी कुंडली का जातक छठे भाव के शनि के अनुसार अपने को सेवा वाले कामो मे ले जाकर अपनी स्थिति को दर्शाने का काम करता है.शनि के बाद वाला ग्रह या राशि व्यक्ति को अपने स्थान से दूर जाने के लिये बाध्य करती है.धनु राशि मृत्यु की राशि के बाद की राशि है,इस लगन मे पैदा होने वाला जातक एक ऐसे परिवार मे जन्म लेता है जिसके पूर्वज पहले अपना सब कुछ बरबाद करने के बाद या तो दूसरे स्थान पर आकर बसे होते है या उन्हे अपने परिवार को त्याग कर दूर जाकर बसने के बाद ही अपने जीवन को चलाने के लिये मजबूर होना पडता है.
  • धनु राशि का चौथा भाव मीन राशि होने के कारण दिमाग मे जो सोच बनती है वह मोक्ष के लिये ही बनती है,मोक्ष का दूसरा नाम शांति से है,जिस कारक से शांति मिलती है वही कारक इस लगन के जातक को अपनाने मे अच्छा लगता है। 
  • मीन राशि का मालिक हकीकत मे राहु होता है,राहु का कार्य अचानक सोच को देना होता है जो कहा जाये उसे पूरा करने की योग्यता को भी देना होता है,पहली कुंडली मे राहु का स्थान इसी राशि मे है,राहु की नजर मीन राशि के अलावा वृष राशि पर भी है कर्क राशि पर भी है कन्या राशि पर भी है,और बारहवे भाव की वृश्चिक राशि पर भी है.चौथे भाव मे होने से सोच का रूप आसमानी शक्तिओं के अनुसार बन जाता है,जो भी सोचा जाये जो भी मन मे लाया जाये उसे अपने दिमागी असर से नही बल्कि आसमानी सोच के प्रभाव से ही माना जा सकता है.यह सोच मनुष्य को मनुष्य के जीवन मे भी रखकर सोच ईश्वरीय शक्ति की ही देती है.इस सोच मे चौथे भाव मे होने पर जो भी मानसिक लगाव होता है वह शांति को प्रदान करने के लिये ही माना जा सकता है ऐसा व्यक्ति एक स्थान पर बैठा जरूर होता है लेकिन उसका विचरण अन्य दुनिया मे होता है वह एक स्थान पर बैठ कर किसी भी स्थान के बारे मे वर्णन केवल इसलिये कर सकता है क्योंकि यह राहु उसके सामने अन्तर्मन से घटनाओ को उजागर करने के लिये अपने बल को देता है.
  • इस राहु का दूसरा प्रभाव उन कारणो को जान लेने का होता है जो कर्जा दुश्मनी बीमारी और दैनिक जीवन मे मिलने वाली दिक्कतो के लिये माना जा सकता है,छठे भाव मे राहु की पहुंचने वाली शक्ति से इस लगन का जातक अपने मन के अनुसार वही बात सोचता है जो लोगो के प्रति उनकी आगे की संतति मे मिलने वाली बाधा (वृष राशि कुटुम्ब की राशि भी है) लोगो के निर्धन होने पर उन्हे दी जाने वाली आर्थिक सहायता (वृष राशि धन की राशि भी है) तथा जो लोग धन से दुखी है परिवार से दुखी है आगे की संतति से दुखी है उनकी व्यथा को दूर करने के लिये यह राहु अपना काम करता है। इसी प्रकार से राहु की पंचम द्रिष्टि का अष्टम मे विराजमान मंगल पर होने के कारण मंगल जो पैशाचिक शक्तियो का मालिक अष्टम मे जाने से हो सकता है और वे शक्तियां जब जन सामान्य के ऊपर हावी हो जाती है तो लोगो की सोच इंसानियत से बदल कर हैवानियत मे बदल जाती है,इस राहु के द्वारा जब मानसिक बल मिलता है तो वह शक्तियां अपने रूप को बदलकर मानवीय हितो के लिये काम करना शुरु कर देती है,जैसे महामारी के फ़ैलने पर इस राहु की शक्ति के द्वारा रोका जाना,भयंकर बीमार लोगो को अपनी सोच से ही ठीक कर देना,आपसी रंजिस को जो मारकाट से सम्बन्धित हो उसे दया के भाव मे बदल देना आदि। 
  • इस राहु की सप्तम द्रिष्टि कन्या राशि पर है और जब कन्या राशि मे इस राहु का प्रभाव जाता है तो जातक की सोच लोगो की सेवा भावना मे जाने का प्रमाण मिलता है यानी धनु लगन मे पैदा होने वाला जातक उन्ही कामो को करेगा जहां से लोगो की सेवा की जा सकती है,वह सेवा धन से भी हो सकती है अस्पताल से भी हो सकती है बैंक आदि के कार्यों से भी हो सकती है और रोजाना की सेवा श्रुषूसा से भी हो सकती है। केतु के इस भाव मे होने से कार्य और सेवा मे जो लोग अपंग होते है जो लोग साधनो से हीन होते है जिन लोगों की जिन्दगी किसी भी कारण से अपंग हो चुकी होती है उनकी सेवा करने की भावना भी होती है,इसी राहु की नजर जब बारहवे मे विराजमान वृश्चिक राशि मे जाती है तो जातक की नजर उन्ही स्थानो पर शांति के लिये जाती है जहां उजाड हो और उस उजाड मे रहने से उन्हे एक प्रकार की अजीब सी शांति मिलती है,उस शांति का प्रयोग वह दैनिक जीवन मे लेना शुरु कर देते है। इस भाव मे शनि के होने से जातक को ध्यान समाधि स्थान परित्याग और किये जाने वाले कार्यों मे उन्ही लोगो के प्रति उद्धार की भावना होती है जो समाज परिवार देश और स्थितियों से शमशानी कारणो मे पहुंच गये होते है।
  • दूसरी कुंडली मे यही राहु जातक के दूसरे भाव मे है,यह भाव कहने के लिये तो धन का भी कहा जाता है कार्य का भाव इसलिये बन जाता है क्योंकि इस भाव मे मकर राशि आजाती है और इस भाव मे जब राहु सूर्य के साथ होता है तो वह दैनिक जीवन के आधार को बनाने के लिये सरकारी कार्यों की तरफ़ भी चला जाता है बुध से युति होने के कारण जो भी वह कहना चाहता है उसके लिये किसी प्रकार की गणित विद्या जैसे ज्योतिष आदि के साधन सामने करने के बाद बोलता है लेकिन साधन जरूर सामने होते है और तरीके भी गणित के होते है लेकिन ऐसा भी होता है कि जातक जब अपने मे नही होकर अचानक बोलता है तो वह सत्य हो जाता है,यह बात कभी कभी जातक को सोचने के लिये मजबूर भी करती है कि यह किसी भी सिद्धान्त मे नही था लेकिन उसने जो कहा वह सत्य कैसे हो गया ? यही राहु सूर्य बुध को साथ लेकर कुटुम्ब की शक्ति के रूप मे देखा जा सकता है,इस राहु की तीसरी नजर मीन राशि पर होने से जातक जहां भी निवास करता है वहां का माहौल एक प्रकार से ईश्वरीय शक्तिओं से पूर्ण हो जाता है,अगर वह जंगल मे भी जाकर बैठ जाये तो शुक्र पर राहु की द्रिष्टि होने पर भौतिकता का अम्बार लग जाता है,जातक को यह राहु जो प्राप्तिया देताहै वह किसी भी प्रकार से कम नही होती है। राहु बुध और सूर्य के साथ होने पर बुध और सूर्य की सीमा मे विस्तार कर देता है लोग कहते है कि राहु सूर्य के साथ होने से ग्रहण लगा देता है लेकिन यह बात बुध के साथ होने पर राहु के द्वारा नही मानी जा सकती है,कारण राहु और बुध मिलकर सूर्य की सीमा मे विस्तार देते है। सूर्य से तीसरा शुक्र भी इसी मान्यता को पूर्ण करता है कि जातक की माता घर मे बडप्पन लेकर आती है और मीन राशि का शुक्र अगर राहु बुध सूर्य से तीसरा होता है तो वह जातक की उत्पत्ति तीसरी माता से ही देता है,यह राहु माता के मामले मे तीसरी शक्ति से उत्पन्न होने की बात करता है तो जातक के लिये तीसरे स्थान पर जाने के बाद यानी पहले और दूसरे मकान भी जातक के लिये काम के नही रहते है लेकिन तीसरे मकान के अन्दर जाते ही जातक का भाग्य खुल जाता है और जातक किसी भी प्रकार से अपने को दुखी नही रख सकता है,यही बात तीसरे रहने वाले स्थान पर तीन प्रकार के शुक्र होने के कारण भी मिलते है जैसे पत्नी का होना शुक्र के रूप मे वाहन का होना और इसी शुक्र के रूप मे लक्ष्मी का स्थापित होना भी माना जा सकता है। इस राहु का स्थान धन स्थान मे होने के कारण जातक के द्वारा लोगो की धन से काफ़ी मदद की जाती है लेकिन इसी राहु के द्वारा अक्समात निर्णय लेने के कारण हानि भी मिलती है लेकिन यह राहु अपनी योग्यता से लोगो के लिये हित सोचने के कारण अक्समात ही धन की प्राप्ति भी कर लेता है।कार्य की राशि मे होने के कारण और कार्य की राशि का धन स्थान मे होने के कारण जातक जो भी कार्य के समय मे कह देगा वह सत्य होने के लिये भी जाना जा सकता है। इसी प्रकार से जातक अपनी शक्ति को ईश्वरीय शक्ति मे बदलने के लिये भौतिकता का भी सहारा लेकर चलेगा,यह बात केवल शुक्र के अनुसार ही मानी जाती है और तीन शक्तियां वह किसी भी रूप मे रहकर साथ देने के लिये भी सही मानी जायेंगी। वह तीन भाइयो और बहिन की संख्या मे भी हो सकता है पुत्र और पुत्रियो के साथ भी हो सकता है पत्नी और सहायक कार्य करने वाले लोगो के कारण भी हो सकता है। यह राहु छठे भाव पर भी अपनी नजर को दे रहा है जो लोग कर्जा मे होंगे दुश्मनी मे होंगे बीमारी से ग्रसित होंगे आधुनिक कला की जानकारी के अनुसार जातक उन्हे अपनी सहायता जरूर देगा और उस सहायता को लेकर लोग आगे बढते जायेंगे। इस राहु की नजर अष्टम के केतु पर होने पर जातक रिस्क लेकर अगर अपने लिये कोई कार्य ब्रोकर वाला करेगा तो उसे लाभ होना तो है लेकिन वह लाभ को सम्भाल नही पायेगा वह उस लाभ को दूसरे मदो मे लेकर लोगो की सहायता कर देगा। इसी बात को अगर पुरानी मान्यताओ से माना जाये तो जातक को भूत प्रेत और तांत्रिक क्रियाओ की जानकारी भी होगी लेकिन वह दूसरो की सहायता के लिये मानी जा सकती है। इस राहु की गति के कारण एक बार और भी मानी जा सकती है कि जातक अगर अचल सम्पत्ति को खरीदने बेचने मे अपनी मंशा को रखेगा तो धन कैसा भी हो फ़्रीज हो जायेगा इसी प्रकार से शनि से सम्बन्धित कारणो को अपने जीवन मे लाकर वह किसी प्रकार की अपनी धारणा को रखेगा तो भी उसके धन और मानसिक सोच का फ़्रीज होना माना जा सकता है। शनि की उपस्थिति सेवा की राशि मे होने के कारण जैसे ही जातक अपने को सेवा वाले भावो से ऊपर जाकर मालिक की हैसियत से देखने की कोशिश करेगा यह शनि अपनी शक्ति से नीचे बैठा देगा और वापस सेवा के कार्यों मे जाने के लिये मजबूर कर देगा, कार्य का बदलाव कभी भी दिक्कत को देने वाला हो सकता है,जैसे पहली वाली कुंडली मे शनि का स्थान बारहवे भाव मे है तो जातक बाहरी शक्तियों से अपने कार्य को करने वाला था और उन शक्तियो को ग्रहण करने के लिये जातक को वीराने का सहारा लेना पडा था उसी प्रकार से दूसरी कुंडली वाले जातक को अपनी शक्तियों को लोगो के बीच मे रहकर अपने खुद के परिवार मे रहकर ही प्राप्त किया जा सकता है।
  • इस शनि का प्रभाव जीवन के दूसरे वर्ष मे जीवन के छठे वर्ष मे और जीवन के तीस से लेकर बत्तिसवे वर्ष तक दिक्कत देने का कारण बनता है कहने मे तो यह भी कहा जा सकता है कि शनि अपनी कठोरता से जातक को कुम्हार के बर्तन की तरफ़ से कूट कर पकाकर मजबूत बनाने की कोशिश करता है जो मुलायम होते है वह आकार ग्रहण कर लेते है और जो कठोर होते है अपने जीवन की तराजू को खुद के द्वारा तौलना चाहते है वह टूट कर बिखर जाते है,शनि जीवन की मर्यादा को झेलने की शक्ति भी देता है,यह शनि अगर पहले भाव से छठे भाव तक अपना रूप दर्शित करता है तो वह जातक को शादी के पहले तक ही दुखी करता है और शादी के बाद सुखी जीवन जीने के लिये आगे बढा देता है तथा यही शनि अगर सप्तम के बाद से बारहवे भाव तक होता है तो या तो वैवाहिक जीवन से दूर रखता है या वैवाहिक जीवन मे कठोरता को देकर तरह तरह की दिक्कते देने के लिये भी माना जाता है उसी प्रकार से राहु का क्षेत्र भी अगर जीवन मे सप्तम से पहले होता है तो जातक को ईश्वरीय शक्तियों का साक्षात्कार शादी से पहले होता है और बाद मे उसे अपने जीवन के सभी सुख भोगने के बाद जैसे ही केतु वाली उम्र मे साधु जैसा जीवन जीने के लिये मजबूर कर देता है,यह भी देखा जाता है कि सप्तम से पहले अगर केतु होता है तो जातक शादी के पहले ही साधु का जीवन जी चुका होता है और वह जीवन के दूसरे भाग मे रोमांस वाला जीवन जीता है लेकिन जिनके केतु का स्थान सप्तम के बाद होता है वह जीवन की उपलब्धियां शादी से पहले प्राप्त करने के बाद अपने को सांसारिक जीवन से दूर करना शुरु कर देते है। 
  • यही बात मंगल के लिये भी मानी जाती है अगर जातक के जीवन मे मंगल का स्थान सप्तम से पहले होता है तो जातक अपने जीवन के अन्दर सभी प्रकार के पराक्रम और तकनीकी ग्यान को शादी से पहले सीख चुका होता है और अगर जातक का मंगल सप्तम या सप्तम के बाद होता है तो जातक वैवाहिक जीवन को तकनीकी रूप से ही जी सकता है अन्यथा शादी के बाद कई प्रकार के लडाई झगडे और जीवन साथी काम करने वाले स्थान पर क्लेश के कारण भी बनते रहते है। साथ ही जब मंगल मेष या वृश्चिक का होता है तो जातक को बात का पक्का बना देता है और जब मंगल कर्क मीन या वृष राशि का होता है तो वह बात से दूर भाग जाने का क्रम बनाता है।
  • बुध मार्गी का कारण भी देखा जाता है कि वह दूसरो के लिये गुणगान करने वाला होता है और जब वह वक्री होता है तो लोग उसके बारे मे ही बखान करने लगते है.
अक्सर जिस राशि मे चन्द्रमा होता है उस राशि मे व्यक्ति की पहुंच पर ही सोच को देने के लिये और लोगो के अन्दर जानकारी देने के लिये माना जा सकता है,जब तक व्यक्ति चन्द्रमा तक नही पहु़ंचता है तब तक वह जनता के बारे मे सोचता है जैसे ही वह चन्द्रमा की सीमा को लांघ जाता है जनता उसके बारे मे सोचने लगती है,पहली कुंडली मे चन्द्रमा धनु राशि का है और यह राशि मौत के बाद की राशि है जब तक जातक जिन्दा रहता है लोग उसके बारे मे नही सोच पाते है जैसे ही जातक की मौत होती है लोग उसके बारे कई प्रकार की बाते सोच कर और उसके कार्यों को सोच कर उसके प्रति बाते करने लगते है दूसरी कुंडली मे भी चन्द्रमा तुला राशि का है जब तक जातक नौकरी और वैवाहिक जीवन मे जाता है वह लोगो के लिये सोचता रहता है लेकिन जैसे ही शादी होती या नौकरी लगती है जातक के प्रति लोग सोचने लग जाते है।
शिरडी की माटी का यह भाग इसलिये और लिखना पडा कि लोगो की मुख्य सोच अगर ज्योतिष से देखी जाये तो यह राहु किस प्रकार से भावना को बदलने के बाद कहां व्यक्ति को पहुंचा सकता है,और जो लोग इस सोच को धारण करते है वह धारणा केतु के लिये कितनी लाभदायक हो जाती है इस बात को ग्यानी लोग ही समझ सकते है और समय पर उपयोग मे ला सकते है.

Thursday, April 19, 2012

शिरडी की माटी (भाग 3)

हमारा धरती पर आने के लिये दो कारण माने जाते है पहला तो हम अपने लिये ही आते है और दूसरा हम दूसरो की सहायता करने के लिये आते है.जब हम केवल अपने ही जीवन की गाडी में उलझे रहते है तो वह हमारी निजी गाडी होती है जब हम दूसरो की गाडियों को सुधारने के लिये अपने को प्रयोग मे लाते है तो हमारी बिसात एक मैकेनिक से अधिक नही होती है लेकिन हम जिस गाडी मे उलझे रहते है वह एक ही माडल की गाडी होती है जब हम दूसरो की गाडियों मे उलझने का काम करते है तो वह तरह तरह के माडल की गाडियां होती है। अगर वास्तविक रूप से योग्यता को माना जाये तो केवल एक गाडी की जानकारी से अधिक योग्यता अधिक गाडियों के बारे मे जानने से मानी जा सकती है तो मैकेनिक कहने के लिये तो छोटी औकात होती है लेकिन वह योग्यता मे गाडी मालिक से कहीं अधिक होता है। यही बात संतो के लिये मानी जाती है कहने के लिये उनके पास एक झोली के अलावा कुछ नही होता है लेकिन वह किसी भी दुखी व्यक्ति की पीडा को हरने की योग्यता को रखते है जबकि एक गृहस्थ के पास सब कुछ होते हुये भी वह किसी न किसी पीडा से ग्रसित ही रहता है। किसी की कुंडली मे देखा जाये तो केन्द्र भरा होता है और किसी की कुंडली मे देखा जाये तो केन्द्र खाली होता है,जब केन्द्र भरा होता है तो वह एक गृहस्थ के रूप मे माना जाता है और वह अपनी ही गाडी को सम्भालने और चलाने की फ़िकर मे रहता है लेकिन जब केन्द्र खाली होता है तो वह दूसरो के हित के ही काम करता रहता है.या ऐसे माना जाये कि वह एक गाडीवान है और बिना किसी परिश्रम की कीमत लिये सन्तो को लाने लेजाने का काम करता है। दूसरो के लिये जो अपने जीवन को लेकर चलता है उसके लिये परमात्मा भी योग्यता को देकर भेजता है योग्यता को देखने के लिये त्रिकोण की सीमा को ज्योतिष से वर्णित किया गया है। जब त्रिकोण मे केतु का उपस्थित होना मिल जाये तो वह व्यक्ति एक सहायक के रूप मे संसार सेवा मे लगने के लिये अपनी योग्यता को जाहिर करता रहता है। उपरोक्त कुंडली मे केन्द्र खाली है केवल प्लूटो जीवन को मशीन बनाकर विराजमान है,प्रदर्शन मे चन्द्रमा है विद्या और बुद्धि मे तथा शिक्षा मे केतु है,सेवा मे गुरु है रिस्क लेने और अपमान तथा गूढ विषयों के प्रति सेवा करने जानकारी रखने गुप्त भेद जाने की राशि मे सूर्य और शनि है,धर्म कानून नियम ऊंची शिक्षा विदेशी जानकारी राज्य और राजनीति के प्रति जानकारी के प्रति तकनीकी विकास और तकनीकी कामो के प्रति मंगल बुध और शुक्र की उपस्थिति है,ग्यारहवे भाव मे कर्म करने के फ़लो को देखा जाता है वहां राहु और यूरेनस की उपस्थिति है,बारहवे भाव मे नेपच्यून की उपस्थिति है। एक चार सात तथा दस मे कोई ऐसा ग्रह नही है जो सजीवता को प्रमाणित करता हो। इस प्रकार से इस व्यक्ति का जन्म दूसरो की सेवा करने के लिये ही हुया है।

दक्षिण भारत मे नाडी ज्योतिष के लिये हमने देखा है कि वे अधिकतर मामले मे ताड पत्रो के अलावा एक काम और करते है कि जातक की जन्म तारीख आदि के बारे मे भी पूंछते है जरूरी नही है कि हर आदमी की विवेचना ताड पत्र से ही की जा सके,वह जन्म तारीख के अनुसार घर के नाम आदि बखान करने के लिये कुछ प्रश्न करते है और उन प्रश्नो के आधार पर ही जातक के जीवन की विवेचना करते है,जैसे उपरोक्त कुंडली मे यह भावना तो देखी ही जा सकती है कि जातक के केन्द्र मे कोई ग्रह नही होने से वह दूसरो की सेवा के लिये पैदा हुआ है। केतु किसी नाम की व्याख्या नही करता है,केवल नवे भाव मे तीन ग्रहो की सम्मिलित रूपरेखा से जातक का नाम देखा जा सकता है.इसके अलावा भी अगर नवमांश को देखा जाये तो वहां भी नवे भाव मे शुक्र केतु का साथ चन्द्रमा की राशि कर्क मे हो गया है,अगर इसी कुंडली को भाव श्रीपति मे ले जाते है तो यह कुंडली अपना रूप अलग ही प्रकाशित कर देती है,(भाव श्रीपति विष्णु रूप मे जीव के प्रकट होने की विवेचना से माना जाता है और दक्षिण भारतीय ज्योतिष मे इस प्रथा का गुप्त रूप प्रयोग किया जाता है जो जन सामान्य की समझ से बाहर की बात होती है) इस कुंडली के अनुसार अष्टम भाव मे सूर्य शनि शुक्र बैठ जाते है। इसी पद्धति के अनुसार यह भी देखा जाता है कि लगन की नजर हमेशा अष्टम पर होती है,यानी शरीर का कारण अन्तिम गति से जुडा होता है। शरीर की जीवन के अन्त मे क्या दशा होनी है वह इसी भाव से जुडा होता है। यह भाव गुप्त शक्तियों के रूप मे जाना जाता है,और योगी साधना को करने के लिये इसी भाव का प्रयोग करते है। इसी पद्धति से अगर केतु का स्थान देखा जाये तो वह चौथे भाव मे है और मेष राशि का है,तथा अपनी पंचम द्रिष्टि से अष्टम मे बैठे सूर्य शनि शुक्र को देख रहे है,केतु के लिये सन्यासी सूर्य के साथ केतु मिलकर विष्णु शनि के साथ केतु के मिलने से शिव और शुक्र के साथ केतु के मिलने से शिव की मान्यता देखी जा सकती है,एक सन्यासी के अन्दर इन तीनो शक्तियों का होना जगत गुरु दत्तात्रेय के लिये ही माना जाता है।

तीसरा भाव घर की शिक्षा पंचम भाव प्राथमिक शिक्षा सप्तम भाव माध्यमिक शिक्षा और नवा भाव कालेज की शिक्षा तथा दूसरे भाव से शिक्षा के बाद अन्य उपाधिया जैसे डिप्लोमा किसी विषय मे अन्य डिग्री आदि का लेना माना जाता है। कालपुरुष के अनुसार शिक्षा का विश्लेषण करने पर घर की शिक्षा के लिये बडे भाई या बहिन की बात मिलती है प्राथमिक शिक्षा के लिये कान्वेंट जैसी शिक्षा मिलती है तथा कालेज शिक्षा मे तकनीकी शिक्षा का होना मिलता है और उस तकनीकी शिक्षा के अन्दर कोई उच्च डिग्री आदि के लिये दो और शिक्षाये मिलती है। जातक अपनी योग्यता से अपने धर्म परिवेश को तकनीकी शिक्षा से विदेशी परिवेश मे फ़ैलाने के लिये अपनी योग्यता को रखता है,साथ ही बैंक फ़ायनेन्स अस्पताली दवाइयों के मामले मे तकनीकी कारणो मे खेती किसानी आदि मे पानी के साधनो मे जो सोफ़्ट्वेयर काम करते है और जो स्वचलित रूप से अपने कार्य को करते के कार्यों मे जाना उचित माना जाता है,यही कारण जातक को अगर व्यापारिक रूप से करने होते है तो वह अपनी योग्यता को तरह तरह के सोफ़्टवेयर आदि को बनाकर बेचने के काम शिक्षा से सम्बन्धित कम्पयूटर की उपयोगिता के काम करने मे भी सफ़ल माना जाता है। लेकिन जो भी कार्य जातक के द्वारा होते है वह लोक हित के लिये ही माने जाते है उन साधनो का उपयोगों के लिये खुद का कोई लाभ नही मिलता है इस प्रकार से संत वही है लेकिन रूप बदला है तो केवल आधुनिक विज्ञान की सीमा मे जाकर नये नये रूप ईजाद करने के लिये और नये नये रूप मे लोगो की आवश्यकताओ को पूरा करने के लिये।

शिरडी की माटी (भाग 2)

जब जनता की शिकायत अधिकारी के पास पहुंचने लगती है तो पहले तो वह शिकायत को नजरंदाज करता रहता है कि हो सकता है किसी ने कोई भूल से काम किया हो और वह उस भूल को सुधार ले लेकिन जब शिकायते अधिक आने लगती है तो अधिकारी जांच के लिये निकल देता है,वह सभी प्रकार के अपने जांच के कारको को प्रयोग मे लाता है और जब देखता है कि गल्ती अधिक हो रही है तो गल्ती करने वाले को दंड देने और जिनके साथ गल्ती हुयी है उन्हे सहायता देने का काम करता है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि शिकायत करने के लिये भीड तो जाती है लेकिन अधिकारी या तो नियुक्त नही हुआ होता है और जब तक नियुक्त होता है तब तक जनता चली जाती है,उस बीच मे उस अधिकारी से भी बडे अधिकारी को शिकायते दूसरे मार्ग से मिलती है वह अपनी योग्यता से अपने कार्यों को पूरा करने के लिये अन्य साधनो का प्रयोग करता है। इसी प्रकार से परम पिता परमात्मा इस धरती पर आत्माओं को भेज कर जांच करवाता है कि धरती पर कितना अधर्म हो रहा है कितना धर्म हो रहा है कितना जीव को सताया जा रहा है और कितना जीव के साथ प्रकृति इंसाफ़ कर रही है कि नही कर रही है जीव का उद्देश्य परहित मे है कि नही आदि की जानकारी लेने के लिये वह मानवीय रूप मे आत्मा को धरती पर भेज कर उसके जाने के बाद उसके सुकर्मो और दुष्कर्मो की मीमांशा करता है भेजी जाने वाली आत्मा को तो सुकर्मो और दुष्कर्मो की सजा मिलती ही है लेकिन उसके कर्मो और के प्रति भी परमात्मा को पता चल जाता है कि धरती पर किस प्रकार से पाप और पुण्य घट बढ रहे है।

प्रस्तुत कुंडली विश्वप्रसिद्ध शिरडी धाम मे जन्म लेने वाली एक जातिका की है,पंचम भाव मे गुरु और नवम भाव मे सूर्य का होना जीवात्मा योग होने की बात को प्रकट करता है,यह जीवात्मा योग ईश्वर अंश से जन्म लेने की क्रिया को कहा जाता है और जो कारण इस जन्म के लिये माने जाते है वह गुरु का शिक्षा के भाव मे और सूर्य का धर्म के भाव मे होना भी यह प्रकट करता है कि जातिका का उद्देश्य शिक्षा से धर्म और मीमांशा के प्रति लोगों को बताना तथा उस सूर्य रूपी आत्मा को जो अपने नि:स्वार्थ भाव से धर्म के प्रति समर्पित है का गुणगान करना भी है। बुध वक्री है और मार्गी बुध तो दूसरो से कहने सुनने और अपने प्रभाव को प्रसारित करने के लिये माना जाता है जब कि वक्री बुध केवल दूसरो के भावो को सुनने के बाद उसका प्रभाव धार्मिक रूप से विवेचन मे लाकर प्रयोग करने के लिये माना जाता है। वैसे तो कहा जाता है कि बुध वक्री उल्टी बात करता है लेकिन उल्टी बात का मतलब यह नही होता है कि वह गाली देता है बल्कि बुध वक्री का मतलब होता है कि वह प्रश्न करने वाला होता है और उत्तर देने के लिये वह जिस भाव पर अपनी नजर रखता है वही भाव अपनी योग्यता के अनुसार बुध को जबाब देते है,लेकिन बुध वही प्रश्न करता है जिस ग्रह के साथ होता है तथा जिस ग्रह का असर द्रिष्टि से बुध को मिलता है इसके साथ ही उसके प्रश्न अमिट रूप से वही रहते है जो जन्म के समय मे बुध के प्रति अपनी धारणा को प्रकट करते थे,इसके अलावा भी सांसारिक गतिविधि का रूप भी तब और समझ मे आता है जब बुध गोचर से विभिन्न भावो मे गोचर करता है और जो भी उस भाव का सामयिक कारण और रूप होता है उसके बारे मे भी अपनी धारणा को जन्म के बुध की प्रकृति को साथ रखने से और केवल प्रश्न करने की क्रिया को ही प्रस्तुत करने की मान्यता से समझा जा सकता है। इस बुध से यही माना जाता है कि जातिका को प्रश्न करने की आदत है वह किसी भी बात को उल्टा इसलिये कहती है कि सामने वाला जबाब दे सके लेकिन सामने वाला जबाब तभी दे पायेगा जब वह दिमागी रूप से बुद्धिमान है और उसे बजाय करके दिखाने के समझाने की पूरी जानकारी है। करके दिखाने के लिये तो वही लोग सामने आते है जिनके पास शरीर का बल होता है लेकिन समझाकर दिखाने का कार्य वही करते है जिनके पास दिमागी बल होता है और वह अपने समझाने के तरीको को विभिन्न रूप मे सामने लाकर प्रस्तुत कर सकते है। कभी कभी यह भी देखा जाता है कि जो व्यक्ति कहना चाहता है वह सामने वाला समझ रहा है कि नही अगर कहने वाला उल्टा बोलता है और सामने वाला भी उल्टे को उल्टे रूप मे ही प्रस्तुत रखने की कला को जानता है तो दोनो अपनी अपनी बात को एक दूसरे को समझा कर सन्तुष्ट होजायेंगे और सामने वाला उल्टी बात का जबाब जब समझाने की बजाय ताकत से देना शुरु कर देता है तो उल्टा बोलने वाला या तो कभी उल्टी बात को करता ही नही है या वह हमेशा के लिये शांत हो जाता है।उल्टी बात करने का भी एक असर होता है कभी कभी कोई बात उल्टी की जाये और वह शास्त्र सम्मत हो तो उस उल्टी बात का भी आदर किया जायेगा और जब कोई उल्टी बात की जाये लेकिन वह गाली जैसी लगे तो जो सुनेगा वह बजाय उत्तर देने के या तो अपनी दिमागी शक्ति से कोई कानूनी काम करने के लिये राजी हो जायेगा या फ़िर अपने देह बल को प्रयोग करने के बाद दांत तोड देगा। इस कुंडली से भी यही समझ मे आता है कि बुध के वक्री होने का असर तो है लेकिन बुध पर गुरु के प्रभाव के कारण जो भी बात बुध करना चाहता है वह धर्म से सम्बन्धित है शिक्षा से सम्बन्धित है जीवन साथी से सम्बन्धित है बुध के राजकीय ग्रह के साथ होने से तथा राज्य के ग्रह सूर्य पर अपना असर देने के कारण सरकारी कानून से सम्बन्धित है के कारण जो भी बात बुध के द्वारा उल्टे रूप मे की जायेगी वह सुनी भी जायेगी और उसका उत्तर भी बजाय शरीर की शक्ति का प्रयोग करके दिमागी शक्ति को प्रयोग करने के बाद ही दिया जायेगा। इस बात को समझने के लिये जातिका के तीसरे भाव मे विराजमान वक्री शनि से देखा जा सकता है। मार्गी शनि शरीर की शक्ति से काम लेने वाला होता है लेकिन वक्री शनि दिमागी शक्ति से काम लेने वाला होता है जब मशीनी ग्रह और तकनीक का मालिक प्लूटो भी साथ हो जाता है तो वह शानि मशीनी रूप से दिमागी उत्तर प्रस्तुत करने के लिये अपनी योग्यता को जाहिर करने लगता है।

सूर्य के धर्म के भाव मे रहने से जातिका का अहम केवल धर्म और मर्यादा के प्रति माना जाता है साथ ही सूर्य पर गुरु की नजर होने से जातिका अपने परिवेश और परिवार मे भी धर्म और संस्कृति के प्रति अटल विश्वास रखने वाली होती है वह किसी भी सम्बन्ध को केवल धर्म और पारिवारिक सम्बन्ध की द्रिष्टि से देखती है उसे अपने परिवेश का पूरा ग्यान है कि वह कहां से आयी है उसे क्या करना है उसकी धारणा क्या है उसे जीवन मे किस प्रकार के कार्य करने है और वह किस प्रकार से दूसरो से किस प्रकार के कार्य करवाने की क्षमता को रखती है। अक्सर देखा जाता है कि बहुत कम लोग ही इस बात से सम्बन्ध रखते है कि गुरु और नेपच्यून जब एक राशि मे हो और उस राशि का सम्बन्ध अगर धर्म संस्कृति और जीवन के साथ साथ न्याय दर्शन महापुरुषो के विचार उन विचारो के द्वारा समाज और धर्म के  प्रति चलने वाले विश्वास आदि भी नेपच्यून और गुरु की संगति से जातिका के पास मिलते है। एक संत की आत्मा का प्रादुर्भाव भी इसी गुरु और नेपच्यून की संगति पर जाना मिलता है और इस प्रकार की युति यही वर्णन करती है कि जातिका रूप भले ही संसार मे साधारण मनुष्य के रूप मे है लेकिन वह आत्मा से एक संत की आत्मा को लेकर ही इस धरती पर आयी है। इसी बात से एक प्रश्न और बनता है कि आखिर आत्मा का इस धरती पर आने का कारण क्या है ? इस बात को देखने के लिये :-
  • गुरु ने बल दिया सूर्य और वक्री बुध को तथा सूर्य और वक्री बुध ने अपने बल को वक्री शनि और प्लूटो को दे दिया,वक्री शनि ने अपने बल को प्लूटो की सहायता से वापस गुरु को अपना बल दे दिया।
  • वक्री शनि और प्लूटो ने अपना बल गुरु नेपच्यून को दिया गुरु ने उस बल को सूर्य और बुध पर दे दिया और सूर्य बुध (व) ने अपना बल वापस शनि प्लूटो को दे दिया।
  • सूर्य और वक्री बुध ने अपना बल शनिवक्री और प्लूटो को दिया शनि वक्री और प्लूटो ने अपना बल गुरु और नेपच्यून को दे दिया,गुरु वह बल वापस सूर्य बुध वक्री को दे दिया.
यह तीनो मीमांशा केवल शरीर और पहिचान (लगनेश से) शिक्षा संतान बुद्धि जीवन की सोच (पंचमेश से) जीवन साथी जीवन मे आने का उद्देश्य और जीवन के कार्य लोगों को दी जाने वाली सलाह (सप्तमेश से) मिलती है,साथ मे जिन और शक्तियों ने बल दिया है उनके अन्दर भौतिक धन कुटुम्ब पहिचान तथा अपने से बडे मित्र भाई बहिन आदि के मालिक बुध (व) ही बाकी का किसी का कोई लेना देना नही है यह भी है कि जो भी बुध वक्री ने दिया है वह जातिका वापस भी कर देगी किसी का कोई अहसान भी अपने पर नही रख सकती है।

परमात्मा भी अपनी कला को किस प्रकार से बदल कर प्रस्तुत करता है उसकी मिशाल नही मानी जाती है,पुरुष राशि मे पुरुष ग्रह के साथ अगर बुध मार्गी होता तो वह पुरुष रूप मे इस जगत मे प्रकट होता,लेकिन बुध के वक्री होने के कारण वह स्त्री रूप मे प्रकट हो गया। यही बात जीवन साथी के लिये भी मानी जा सकती है कि स्त्री राशि मे सप्तमेश शनि स्त्री रूप मे प्रकट होने थे लेकिन वक्री होने के कारण पुरुष रूप मे प्रकट हो गये। इस प्रकार की युति एक पूर्व जन्म के द्वन्द के रूप मे माना जा सकता है कि दोनो आत्माओ के अन्दर यह भाव रहा कि अगर वह स्त्री होती तो वह कुछ कार्य जो पुरुष रूप मे नही कर पाये वह कर सकती थी,तथा यही पति के लिये भी माना जा सकता है कि वह जो कार्य स्त्री रूप मे नही कर पाया वह कार्य वह पुरुष रूप मे कर सकता था और प्रकृति ने जन्म विपरीत लिंगी बनाकर दे दिया। यह भाव प्रकृति के द्वारा दिये गये नामो से भी प्रकट हो जाता है जैसे स्त्री नाम को पुरुष के साथ और पुरुष नाम को स्त्री के साथ,विनय विजय विनीत विह्वल आदि पुरुष वाचक नाम है और किरण किमी आदि स्त्री नाम है।

सूर्य बुध वक्री ने कालेज शिक्षा दी और राहु ने शिक्षा के क्षेत्र मे जाने की अलावा डिग्री दी यह साधारण आदमी के लिये सोचा जा सकता है। जब इसे कालपुरुष की कुंडली के अनुसार देखा जायेगा तो गुरु कालेज शिक्षा मे चला जाता है और राहु धन भाव मे आकर शिक्षा देने वाले अलावा कारको के लिये अपना बल देने लगता है। राहु और चन्द्र मिलकर चिन्ता मे लीन व्यक्तियों को धर्म और न्याय तथा कानून के अलावा ज्योतिष कर्मकाण्ड आदि की शिक्षा दे सकता है,यही राहु कभी तो बहुत से कार्य दे दे और कभी बिलकुल ही नही दे,जो कह दिया जाये वह सत्य हो जाये और लोग सत्य के रूप मे स्वीकार करने लग जायें,तथा यही राहु कार्य के रूप मे चिन्ता का विषय हमेशा प्रस्तुत करना शुरु कर दे। जो सूर्य अपने प्रभाव को सरकारी रूप से या राजनीति के रूप मे प्रस्तुत करना चाहे वह चन्द्रमा की चिन्ता के कारण कुछ कर भी नही पाये और संसार हित के लिये अपने को प्रस्तुत करना शुरु कर दे। जीवन की जद्दोजहद मे शामिल होने के लिये भी परमात्मा कारणो को पहले ही बनाकर भेज देता है,पति के लिये कार्य भाव खाली और पत्नी के लिये रोजाना के कार्यों और सेवा वाला भाव खाली,इन्ही दोनो भावो के लिये पति पत्नी अगर अपनी जीवन की जद्दोजहद को करते रहते है तो उनके लिये जीवन का सार्थक करने का प्रभाव पूरा नही हो पाता है अगर वह अपने अनुसार इन्ही कारणो को जो सामने है उन्हे पूरा करने की कोशिश करते रहे तो वह अपने अनुसार अपने जन्म को सार्थक भी कर सकते है और दुनिया मे नाम तथा लोक हित के लिये मशहूर भी हो सकते है। चन्द्रमा को गुरु बारहवा दे दिया है और सूर्य के लिये गुरु नवा दे दिया है,लोक हित मे गुरु सन्तुष्ट रहने का काम कर रहा है और स्वहित के लिये गुरु भाग्य का काम कर रहा है,जातिका जनता के लिये आश्रय का स्थान देने का काम करती है तो वह प्रसिद्धि की तरफ़ बढ जाती है और वह अगर राज्य या राजनीति से जुड जाती है तो वह एक सम्माननीय व्यक्ति के रूप मे प्रसिद्धि प्राप्त करती है।

Tuesday, April 17, 2012

शिरडी की माटी (भाग 1)

कहा जाता है कि आत्मा जब अपने साकार रूप को प्रकट करती है और उस आत्मा के रूप को प्रकट करने का क्षेत्र शुद्ध और सात्विक होता है तो वह आत्मा अपने अन्दर उन्ही गुणो के शरीर को धारण करके आती है जैसा उस स्थान की धरती का प्रभाव होता है। यह प्रभाव भी उसी प्रकार से माना जाता है जैसे एक बीज को बोने के लिये अलग अलग जमीन का प्रयोग किया जाता है और जमीन के प्रभाव के अनुसार ही बीज की उत्पत्ति होती है। आज संसार मे शिरडी का नाम शिरमौर केवल इसलिये हो रहा है कि उस स्थान की मिट्टी ने भगवत रूप धारण किया था और मनुष्य रूप मे रहकर भी अपनी कृपा को साक्षात किया था,उसी मिट्टी से पैदा होने वाली आत्माओं का विश्लेषण करने का सौभाग्य मुझे मिला है और आप सभी के सामने उन आत्माओं के ज्योतिषीय कथन को प्रकट करना चाहता हूँ,मेरी भी बुद्धि मानवीय है हो सकता है कोई त्रुटि रह जाये या कोई बात लिखने मे गलत लिख जाऊँ,इसलिये विद्व जनो से क्षमा का भाव भी रखता हूँ।

कुंडली मे गुरु जीव का अधिकारी होता है सूर्य आत्मा का अधिकारी माना जाता है मंगल आत्मीय शक्ति को बढाने वाला होता है बुध आत्मीय प्रभाव को प्रसारित करने का कारक होता है शुक्र जीव को सजाने और आत्मा के भावो को प्रकट करने मे अपनी सुन्दरता को प्रकट करता है तो चन्द्रमा आत्मीय मन को सृजित करने का भाव पैदा करता है.शनि भौतिक रूप को प्रकट करता है और जीव के कर्म को करने के लिये अपनी योग्यता को प्रकट करता है। यूरेनस दिमाग के संचार को प्रकट करने और भौतिक संचार को बनाने बिगाडने का काम करता है प्लूटो मिट्टी को मशीन मे परिवर्तित करने का कार्य करता है नेपच्यून आत्मा के विकास का अधिकारी माना जाता है.

समय के अनुसार जीव का रूप परिवर्तन होता रहता है जैसे आदिम युग मे जीव का रूप कुछ और होता था पाषाण युग मे कुछ था मध्य युग मे कुछ और था और वर्तमान मे कुछ और है तथा आने वाले भविष्य मे जीव का रूप कुछ हो जायेगा। जीव वही रहता है रूप परिवर्तन मे सहायक प्लूटो को मुख्य माना गया है,जो आधुनिकता से लेकर अति अधुनिकता को विकसित करने के लिये लगातार अपने प्रभाव को बढाता जा रहा है और हम क्या से क्या होते जा रहे है,लेकिन जीव के विकास की कहानी के साथ आत्मा का रूप नही बदल पाता है जीव कितना ही आधुनिक हो जाये आत्मा वही रहती है। जो भी कर्म किये जाते है उनका प्रभाव आत्मा पर उसी प्रकार से पडता रहता है जैसे एक चिट्टी विभिन्न डाकघरो मे जाकर डाकघर की उपस्थिति को दर्शाने के लिये अपने ऊपर उन डाकघरो की मुहर अपने चेहरे पर लगाकर प्रस्तुत करती है।

प्रस्तुत कुंडली सिंह लगन की है और सूर्य विद्या से प्राप्त बुद्धि के भाव मे विराजमान है,सूर्य का साथ देने के लिये बुध जो लगन का चेहरा और भौतिक प्राप्ति तथा कार्य के प्रभाव का नाम प्रस्तुत करने की भावना को भी देता है। सूर्य का प्रभाव धरती तक लाने के लिये सूर्य किरण ही जिम्मेदार होती है। बिना सूर्य किरण के सूर्य का प्रभाव धरती पर आ ही नही सकता है,बुध को किरण का रूप मानने पर यही पता चलता है कि बुध सूर्य की गरमी रोशनी जीवन की प्रस्तुति को धरती तक लाने के लिये संचार का काम करता है इसलिये बुध को संचार का ग्रह कहा गया है। पंचम भाव विद्या के भाव से दूसरा भाव होने से विद्या से प्राप्त बुद्धि को प्रयोग करने का भाव भी कहा गया है और जब इस भाव मे गुरु की धनु राशि का समागम होता है तो ऊंची शिक्षा वाली बुद्धि को प्राथमिक शिक्षा जैसा माना जाता है। कानून की कारक यह राशि विदेशो से भी सम्बन्ध रखती है धर्म और भाग्य से भी यह राशि जुडी होती है साथ ही यात्रा और धार्मिकता को फ़ैलाने या उस धार्मिकता से लोकहित के कार्य करने के लिये भी अपनी युति को प्रस्तुत करती है। इस राशि के प्रभाव को अगर पंचम मे लाया जाता है तो ऊंची जानकारी को खेल खेल मे प्रस्तुत करने की कला भी मानी जाते है,सूर्य भी हकीकत मे कालपुरुष की कुंडली के अनुसार इसी भाव का मालिक है,राज्य और राजनीति से भी सम्बन्ध रखता है। लेकिन उद्देश्य कुछ भी हो मतलब शिक्षा से ही होता है।

पुराने जमाने की जो कहानी कही जाती है कि गुरुओं मे इतनी दम होती थी कि वे मिट्टी को चलाने फ़िराने लगते थे,वे कहानिया अविश्वसनीय लगती है,हम कभी कभी कह देते है कि यह सब कपोल कल्पित है,लेकिन आज जिधर भी नजर घुमाई जाती है उधर ही मरी हुयी मिट्टी दौड रही है जिस इंसान को देखो मरी मिट्टी से ही खेल रहा है काम कर रहा है उसी मिट्टी को प्रयोग मे लाकर कमा रहा खा रहा है उसी मिट्टी पर बैठ कर भागा जा रहा है उसी मिट्टी से एक दूसरे से संचार कर रहा है,लेकिन उस जमाने की बातें कपोल कल्पित लगती है ! पुराने गुरु पीले कपडे पहिन कर विद्या को प्रदान किया करते थे लेकिन आधुनिक गुरु कम कपडे पहिन कर कम काम करके अधिक बुद्धि का प्रयोग करके जो कारक पैदा कर रहे है उन्हे गुरु की उपाधि से दूर करने के बाद वैज्ञानिक की उपाधि दे रहे है,वास्तविकता भी है कि जब गुरु सुपर गुरु हो जाता है और मरी मिट्टी मे इतनी जान डाल देता है कि उसका जीवन बिना मरी मिट्टी के बेकार सा हो जाता है तो वह दिमाग को हर पल हर क्षण हर मौके पर दौडाने का काम भी करता है और अपने को वैज्ञानिक कहलाने लगता है। वैज्ञानिक शब्द की व्याख्या को देखा जाये तो वह व+ऐ+ज्ञान+इक से ही देखा जायेगा और इसे अगर विच्छेद करने के बाद जाना जाये तो वाममार्गी तांत्रिको से कम नही समझा जा सकता है। व को मुर्दा कहा जाता है ऐ की मात्रा लगाते है मुर्दे मे जान डालने की क्रिया बन जाती है और जो इस क्रिया को प्रयोग करना जानता हो उसे ज्ञानी की उपाधि दी जाती है लेकिन वह सिद्धान्त के ऊपर ही निर्भर है इसलिये इक यानी एक ही के प्रति समर्पित हो जाती है,तो कौन कहता है कि वैज्ञानिक तांत्रिक नही होता है। जीव यानी गुरु को अपने तंत्र से मरी हुयी मिट्टी मे जान डाल कर लोक हित मे प्रयोग किया जाने लगे और लोग उस मरी मिट्टी जिसमे जान डाल दी गयी है उसे प्रयोग मे लेकर अपने को धन्य समझ ले तथा अपनी आवश्यकताओ को पूरा करने के लिये अपनी योग्यता को जाहिर कर दे तो जिसने उस मई मिट्टी मे जान डाल दी है वह किसी संत से कम कहा जा सकता है क्या ?

राहु फ़ैलाव देता है फ़ैलना भी सीमित नही होता है,असीमित होता है और जो व्यक्ति एक साधारण व्यक्ति से कई गुनी योग्यता सीखने की रखता हो तथा अपने को बजाय साधारण आदमी के अलग थलग दिखाने की औकात को रखता हो उसी को वक्री कहा जाता है। राहु हमेशा उल्टा चलता है,राहु को शक्ति के रूप मे देखा जाता है और जब यह राहु गुरु के साथ हो जाये तो खराब भाव मे जाकर यह जहरीली हवा बन जाता है लेकिन अच्छे भाव मे जाकर यह अमृत प्रदान करने वाली हवा भी बन जाता है और जिस व्यक्ति की कुंडली मे राहु लगन मे हो अच्छी राशि मे हो तो बात ही कुछ और होती है। लेकिन सीधा आदमी उल्टे को नही सुधार सकता है केवल उल्टा आदमी ही उल्टे को सुधार सकता है,उसी प्रकार से राहु को सुधार मे लाने के लिये गुरु को भी उल्टा कर दिया जाये तो राहु आसानी से सुधार मे लाया जा सकता है,इस कुंडली को भी देखिये राहु लगन मे है शिक्षा की राशि मे है और गुरु भी वक्री होकर राहु की गति मे बदल गया है साथ ही नवे भाव के मालिक मंगल का तकनीकी सहारा भी ले लिया है तो राहु को सुधार कर अच्छे रूप मे बदलना जाना जा सकता है। जो राहु दूसरो को डराने का काम करता है एक प्रकार से काली आंधी बनकर लोगो को परेशान करता है तो वह राहु वक्री गुरु के सानिध्य मे आकर और मंगल का साथ लेकर असीमित ज्ञान के क्षेत्र को दिखाने प्रकाश मे लाने के लिये और संसार को सामने रखने के लिये अपनी योग्यता को जाहिर कर रहा है। इसी बात को अगर राहु को सिलीकोन माना जाये गुरु को सिलीकोन को तरीके से जोडना और सर्किट आदि बनाने के काम मे लिया जाये तथा मंगल को शक्ति की कारक बिजली के रूप मे देखा जाये तो यह कम्पयूटर का रूप धारण कर सकता है सर्किट बोर्ड पर लगे हुये आई सी कण्डेन्सर रजिस्टेंस ट्रांजिस्टर डायोड आदि की जानकारी भी देता है और उस के अन्दर अपने ज्ञान का प्रयोग करने के बाद लोगो के लिये उस मशीन का तैयार करना हो जाता है जिससे लोग अपने जीवन की जरूरतो को बाहरी लोगो से लिखने पढने से लेकर आने जाने तथा कितने ही प्रकार के कार्य करने के लिये स्वतंत्र हो सकते है। यह वक्री गुरु का ही काम है कि वह शनि प्लूटो यानी मरी हुयी मशीन को हार्डवेयर आदि डालकर उसे सिस्टम से चलाने की क्रिया मे राहु नामका सोफ़्टवेयर डालकर कई प्रकार की मशीनी श्रेणी मे बदल सकता है। अगर इसी जगह पर मार्गी गुरु होता तो वह दूसरे के द्वारा बनाये गये सामान को प्रयोग करने वाला होता लेकिन वक्री गुरु होने के कारण वह अपने द्वारा बनाये गये सामान को दूसरो के हित के लिये प्रयोग करने वाला बन जाता है।

सिंह लगन का चौथा भाव वृश्चिक राशि का होता है यह राशि बहुत गूढ होती है कभी प्रकट रूप से सामने नही होती है जैसा कि मेष राशि का स्वभाव होता है कि उसके मन के अन्दर कुछ भी है वह सामने रख देती है इसलिय ही दूसरो के लिये बलि का बकरा बन जाती है उसी स्थान पर सिंह लगन का जातक अपने विचार बहुत गूढ रखता है और उस बुद्धि का प्रयोग करता है जो बुद्धि साधारण आदमी के पास नही होती है वह अपने भाव को प्रकट करने के लिये गूढ तंत्र का प्रयोग करता है उसे तकनीकी विद्या को प्राप्त करने की आदत होती है साथ ही वह अपने को इतने भेद की नीति के अन्दर रखता है कि मन के अन्दर क्या है जान लेने के लिये अपनी पूरी योग्यता को प्रस्तुत कर सकने के बाद भी यह जाहिर नही होने देता है कि आखिर मे उसकी मंशा क्या थी ? यह राशि तकनीकी राशि भी है और किसी भी प्रकार की तकनीक को दिमाग मे रखने और तकनीकी विद्या के प्रति हमेशा मन को लगाकर चलने के लिये भी मानी जा सकती है यह राशि तकनीक के अलावा दुनिया के भेद मृत्यु के बाद का जीवन पराशक्तियों और शमशानी सिद्धियों के प्रति भी जान लेने की भावना को रखती है। हकीकत मे इस भाव का मालिक चन्द्रमा होता है और जनता का मालिक भी चन्द्रमा होता है दिशाओं से यह दक्षिण पश्चिम दिशा की कारक भी कही गयी है इस प्रकार से जातक की मानसिक रुचि अन्तर की जानकारी के लिये भी मानी जा सकती है।यह राशि नकारात्मक मंगल की राशि भी कही गयी है सकारात्मक मंगल जीव के अन्दर की शक्ति कही जाती है और नकारात्मक मंगल जीव के मरने के बाद उसकी पराशक्ति का कारक होता है। सकारात्मक मंगल जीव के जिन्दा रहने तक साथ देने वाला होता है और नकारात्मक मंगल जीव के मरने के बाद उसकी शक्तियों को दूसरे लोगों के प्रति प्रयोग करने के लिये भी माना जाता है,अक्सर सामाजिक परिवेश मे इस मंगल को लोग भूत प्रेत तंत्र आदि के रूप मे कहते सुने जा सकते है।

यूरेनस इस राशि मे उपस्थित होता है तो जातक के मन के अन्दर एक तो उन शक्तियों को प्रकट करने की इच्छा होती है जो मरने के बाद की जानी जा सकती है दूसरे जातक के अन्दर मरी हुयी मिट्टी के अन्दर से यह जान लेने की कला का विकास भी होता है कि वह कैसे मरी किस अवयव की खराबी से मरी और उस मरी हुई शक्ति के अवयब को जांच लेने की और उसे बदल कर नया जीवन मरी हुयी मिट्टी को देने से भी जानी जा सकती है इस बात को अगर डाक्टरी रूप मे देखा जाता है तो एक प्राणी की मौत के पहले के जीवन को प्राप्त करने के लिये खराब हुये अवयब को बदलने का काम किया जाता है जबकि यूरेनस को संचार का ग्रह माने जाने पर जातक के अन्दर कमन्यूकेशन की चीजों के खराब होने पर उन्हे जांच लेने और उन्हे ठीक करने की क्रिया को जान लेने का कारण भी कहा जाता है इस कारण को अगर देखा जाये तो आज के जमाने मे इन्हे इन्फ़ोर्मेशन तकनीक का जानकार भी कहा जाता है और कम्पयूटर इंजीनियर के रूप मे भी देखा जाता है। नेपच्यून के इस भाव मे होने से यह भी देखा जाता है कि जातक के अन्दर राख से साख निकालने की क्षमता का होना भी होता है वह समझ सकता है कि जो कबाडा हो चुका है उस कबाडे से क्या क्या वस्तु निकाली जा सकती है जो काम की है और उस वस्तु को दूसरी वस्तुओं मे प्रयोग करने के बाद उन्हे काम मे लिया जा सकता है। नेपच्यून का रूप अक्सर आत्मा के रूप मे पाश्चात्य ज्योतिष मे प्रयोग मे लाया गया है लेकिन हमारी संस्कृति के अनुसार से मन के आगे नही मान सकते है मन और आत्मा मे भेद को समझने वाले लोग इस बात को समझ सकते है। जो आत्मा कबाड से जुगाड बनाकर उन्हे काम का सिद्ध कर सके वही एक अच्छे इंजीनियर की श्रेणी मे भी गिना जाता है।

सूर्य और बुध का पंचम भाव मे होना आत्मा का मिलन शिक्षा के क्षेत्र मे जाने का होता है यहा जातक अपनी उपस्थिति को शिक्षा के क्षेत्र मे ले जाने और वहीं से अपनी उन्नति को शुरु करने के लिये भी माना जाता है लेकिन यह बात तभी सिद्ध हो सकती है जब जातक के पुत्र संतान की प्राप्ति हो,उसके पहले सूर्य का उदय होना और सरकारी क्षेत्र मे अपने प्रभाव को दिखाने का कारण नही बनता है,सूर्य से तीसरे भाव मे केतु के होने से भी एक कारण यह भी माना जाता है कि कुम्भ राशि का केतु उन्ही लोगो से मित्रता को बनाता है जब वह मित्रता किसी भी प्रकार से कमन्यूकेशन के मामले मे हो पुरानी ज्योतिष के अनुसार बडे भाई की पत्नी या दोस्त की पत्नी के या बडी बहिन के पति के सहायक कार्यों से जोड कर भी देखा जाता है और  इस केतु को अक्सर सहायक के रूप मे भी माना जाता है चाचा भतीजे का सम्बन्ध भी कायम करता है जीवन के अन्दर एक व्यक्ति की सलाह और शिक्षा जातक को आगे बढाने के लिये भी मानी जाती है।यह केतु पत्नी के रूप मे भी सामने आता है और जातक को अपनी सहायता से आगे बढाने के लिये भी देखा जा सकता है। यह केतु मानसिक रूप से भी अपनी सहायता को देने वाला माना जाता है और जीवन मे जो भी सहायक कार्य है उन्हे करने के लिये भी देखा जा सकता है। संतान मे यह दूसरे नम्बर की संतान का रूप भी समझा जा सकता है और पुत्री संतान के प्रति भी अपनी भावना को रखता है।

जातक एक शिक्षक के रूप मे भी जाना जा सकता है जो लोगो को आधुनिक युग मे विभिन्न प्रकार की मशीनोको उपयोग मे लाने का रूप बताये,जो लोग विद्या से जुडे है उनके लिये कार्य करने का रूप भी प्रस्तुत करता है,साथ ही कालेज शिक्षा मे कार्य को करने का रूप भी दे सकता है जो राजनीति से सम्बन्धित विषयों की जानकारी कानूनी जानकारी और विदेशी परिवेश से जुडी जानकारी को प्रदान करना जानता हो,एक संत जो अपने स्वार्थ की पूर्ति के बिना अपनी सहायता को सेवा के रूप मे लोगों को प्रदान करे भी माना जा सकता है। शनि अपनी नजर से की जाने वाली सेवा से जीवन यापन के लिये कार्य करना भी माना जाता है साथ ही प्लूटो के साथ होने से वह उतना धन नही इकट्ठा कर पाता है जो जीवन मे धन का मोह रखने वाले करते है और बिना उपयोग मे लाये मर जाते है। चन्द्रमा का ग्यारहवे भाव मे होना जातक को उतना ही लाभ दे पाता है जो अपने शरीर की पूर्ति कर ले और कहने के लिये तो उसके कोई भी काम नही बिगडते है जो भी कार्य होता है वह मित्रो की सहायता से पत्नी की सहायता से साथ मे चलने वाले दो लोगो से जो मित्रता की सीमा मे ही होते है के प्रति माना जा सकता है।

Monday, April 16, 2012

द्सवे शनि की वैवाहिक जीवन में बाधा से मुक्ति के उपाय

ज्योतिष के अनुसार दसवां शनि विवाह और वैवाहिक जीवन मे गोचर या जन्म से बाधा देने के लिये माना जाता है.इस शनि की पहली पहिचान यह होती है कि पिता मे जडता होती है और माता मे बडबोलापन होता है। बहुत मेहनत करने के बाद भी केवल इतना मिलता है कि दाल रोटी मुश्किल से प्राप्त की जाये। इस स्थिति मे जब खुद की पूर्ति नही हो पायेगी तो घर मे शादी के बाद का खर्चा और माता की हठधर्मी तथा पिता का सुख दुख मे सहभागी नही होना एक प्रकार से वैवाहिक जीवन और विवाह दोनो के लिये ही दिक्कत वाला माना जायेगा इस शनि के लिये जो उपाय शास्त्र सम्मत भी है और कुछ मनोवैज्ञानिक भी है साथ मे आज के युग के हिसाब से उत्तम भी है को करने से इस बाधा का निकारण हो सकता है।
  • दसवे स्थान के शनि का रास्ता बारहवे भाव में जाने से चौथे भाव मे जाने से और सातवे भाव मे जाने से मिलता है.
  • दसवा शनि का स्थान बदलना घर से दक्षिण-पूर्व दिशा मे पलायन कर जाना हितकर होता है कारण अक्सर मान मर्यादा और रहने वाले स्थान की संगति का असर भी आगे नही बढने देता है इसके लिये अगर रहने वाले स्थान को बदल दिया जाये तो शनि अपना फ़ल उचित देने लगता है.लेकिन जो लोग इस शनि के प्रभाव से अपने निवास को कार्य स्थान मे बदले हुये या अपने निवास को कार्य स्थान मे ही बनाये हुये है वे इस कारण को भी बदल कर अपने कार्यों और वैवाहिक जीवन मे सुधार ला सकते है.
  • दसवे शनि का पंचम त्रिकोणीय भाव परिवार से विमुखता से भी माना जाता है यानी खुद के परिवार और जन्म के बाद मिलने वाले धन से दूर हो जाना लेकिन इसे भली भांति समझने के लिये अपने को अपने ही परिवार मे उपस्थिति को देना और अपनी सामाजिक पारिवारिक व्यवहारिक नीतियों को बदलने के बाद सुधार का आना भी माना जाता है। शिक्षा से तथा बुद्धि से आमने सामने का भेद रखने से अक्सर उन्ही कामो को किया जाता है तो करके सीखे जाते है और उन कामो के लिये बहुत समय की जरूरत पडती है,अगर कामो को करके सीखने वाली प्रक्रिया को बदल कर पढकर सीखना और फ़िर करना जारी किया जाये तो यह शनि अपनी नीति को बदल सकता है.
  • दसवे शनि का एक रूप और भी देखा जाता है कि जातक व्यवसाय करने की अपेक्षा नौकरी करने मे ही रुचि रखता है इसका भी एक कारण है कि वह अपने दिमाग को कम से कम प्रयोग करने के बाद चलने वाली जिन्दगी को जैसा चल रहा है वैसा ही चलने के लिये भी अपनी रुचि को प्रदर्शित करता है इसे बदला जाये और उन कामो को करने का मानस बनाया जाये जहां कार्य को सामूहिक रूप से किया जाता है और मिलकर लाभ को बांटा जाता है इस प्रकार से भी शनि का विभाजन कई स्थानो पर हो जाने के बाद धन की और पारिवारिक सुख की बढोत्तरी होने लग जायेगी.
  • पिता के रूप मे जडता को बदलने के लिये पिता की सेहत का ख्याल किया जाये और उन्हे कार्यों मे सहायता की जाये,माता की हठधर्मी को रोकने के लिये उन्हे अपने मर्जी के कार्यों मे लगा रहना चाहिये तथा उनकी किसी राय को मिलने से पहले ही राय को जान लेना चाहिये इस प्रकार से उन्हे यह नही लगेगा कि वे जो कह रही है कोई सुन नही रहा है और उस प्रकार से उन्हे चिल्लाना या क्रोध करने की आदत पड जाती है,अक्सर यह शनि माता को कानो के रोग भी देता है जिससे उन्हे जोर से बोलने की आदत हो जाती है इस काम को भी किसी अच्छे ई एन टी का चैक अप करवाकर ठीक करना सही हो सकता है.
  • शादी अगर हो गयी है तो जीवन साथी को सांस की बीमारी भी होती देखी गयी है,यह बीमारी लगातार शनि वाले कामो मे लगे रहने से या अधिक समय ठंडे और शीलन भरे माहौल मे रहने से या इसी प्रकार के देशो मे रहने से भी होता है अक्सर देखा जाता है कि यह शनि घर के अन्दर के काम और जहां भी काम किया जाता है वहां पर बहुत सी जिम्मेदारियों को दे देता है इस प्रकार से न तो भोजन की क्रिया समय से हो पाती है और न ही खुली धूप मे जाया जा सकता है इस काम के लिये जातक अपने जीवन साथी को सम्भालने के लिये और उपरोक्त कारणो को रोकने के बाद भी अपनी जीवन रेखा को सम्भाल सकता है.
  • अक्सर देखा जाता है कि दसवे शनि के होने पर लोग धर्म और भाग्य को नही मानते है इस प्रकार से जो भी सहायता उन्हे भाग्य से मिलने वाली होती है वह फ़्रीज हो जाती है जैसे भाग्य के बाद ही कर्म का घर आता है और कर्म के घर मे शनि होने से जो भी भाग्य से मिला है वह फ़्रीज हो जाता है इसलिये जातक को अपने धर्म के अनुसार पूजा पाठ और सामाजिक नियमो को भी निभाना सही है,जो किया जा रहा है वह तो सही है लेकिन जो किया जा रहा है उसका फ़ल भी सही मिले तो वह कारण केवल भाग्य के कारण ही मिल सकता है.
  • दसवे शनि के होने पर जातक को पीठ की बीमारी भी होती देखी जाती है यह उनके अधिक काम करने और भोजन आदि मे समय के अभाव या कम मिलने के कारण भी देखा जा सकता है इसलिये जातक को समय से भोजन और समय से नीन्द का निकालना भी जरूरी है,साथ ही सोने वाले स्थान पर बजाय कठोर वस्तुओ के मुलायम वस्तुओ का उपयोग करना भी ठीक रहता है.इस शनि के कारण अक्सर उम्र की तीसरी सीढी पर आकर कमर झुक जाती है या किसी प्रकार से रीढ की हड्डी की बीमारी हो जाती है इसलिये ध्यान रखना जरूरी है.
  • दसवे शनि के लिये पुरुष और स्त्री दोनो ही बायें हाथ की बीच वाली उंगली मे ही नीलम आदि को धारण कर सकते है,अगर राहु अष्टम मे है तो नीलम का पहिनना खतरा भी दे सकता है.तब शनि के मंत्रो के जाप करने के बाद ही सफ़लता मिलती है.
  • इस शनि मे एक बात और भी देखी जा सकती है कि माता परिवार से कोई न कोई आकर घर मे टिका होता है उसका सम्मान करना भी जरूरी होता है.
  • दसवे शनि को दूर करने का एक उपाय और भी माना जाता है कि रहने वाले स्थान पर पूजा आदि मे लगातार दीपक का जलाया जाना.
  • शरीर और कार्य मे अधिक आलस आने पर मूंगा से बनी प्रवाल भस्म का शहद के साथ प्रयोग करना.
  • तुरत शादी और वैवाहिक जीवन मे फ़ायदा के लिये मजदूरों को भोजन देने की क्रिया को शुरु कर देना.

विवाह मे बाधा

जीवन के चार पुरुषार्थो मे विवाह भी तीसरे पुरुषार्थ काम नाम की गिनती मे आता है। इस पुरुषार्थ के बाद शरीर जीवन और जीवन के उद्देश्य मिल जाते है जातक अपने जीवन को इसी पुरुषार्थ मे निकाल लेता है। कई बार ऐसी ग्रह युति बन जाती है कि सोच कर भी विवाह करना भारी पड जाता है और केवल भटकाव का रास्ता ही मिलता है.प्रस्तुत कुंडली वृश्चिक लगन की है मालिक मंगल दसवे भाव मे है। मंगल की द्रिष्टि मे धर्म और भाग्य का मालिक चन्द्रमा है। जीवन का हर काम चन्द्रमा के ऊपर ही निर्भर है और चन्द्रमा को भी खुद मंगल ने अपने कन्ट्रोल मे रखा हुआ है,मंगल को स्त्री कुंडली मे भाई के रूप मे भी मानते है पिता के घर मे होने से पिता के भाई के रूप मे मानते है और इस मंगल के अन्दर शुक्र और शनि का प्रभाव आने से मंगल का रूप नेक न होकर बद के रूप मे बन गया है। मंगल की नजर जब भाग्य और धर्म के कारक चन्द्रमा पर है तो जातिका का चाचा या चाचा जैसा रिस्तेदार जातिका के पिता के स्थान पर अपनी भूमिका को अदा कर रहा है शनि को बडे भाई के रूप मे जाना जाता है इसलिये जातिका के पिता का बडा भाई भी अपनी युति को विवाह नही करने और अपने अनुसार विवाह करने के लिये अपनी योजना को बनाता है लेकिन मंगल की बदनीयती से शादी मे दिक्कत का होना माना जाता है। पिता का कारक सूर्य लाभ और जोखिम के काम के अन्दर तथा केतु की पंचम नजर से आहत होने के कारण परिवार मे अपने ही बच्चो को कोई सहायता नही दे पा रहा है वह अपने परिवार को संगठित रखने के लिये अपने को अपने बडे और छोटे भाई के प्रति समर्पित है जबकि पिता के दोनो भाई अपनी योजना के अनुसार जातिका के दादा की दुश्मनी को निकालने के लिये कि जातिका के दादा ने एक अलग से रकम का बन्दोबस्त जातिका की शादी के लिये किया था और उस रकम का उपयोग दोनो भाइयों ने पिता को विस्वास मे लेकर अपने कार्य और घर के निर्माण मे लगा दिया,जब जातिका का पिता उस धन के लिये जो शादी के लिये प्रयोग मे लाना है की बात करते है तो वे दोनो कोई न कोई बहाना बनाकर शादी वाले कारण को और आगे बढा देते है। जातिका की माता भी अपनी तीन सन्तानो से परेशान है.पुत्र सन्तान शिक्षा के प्रति पहले तो जागरूक रहे लेकिन अपनी शिक्षा को प्राप्त करने के बाद अपने अपने कार्य मे लग गये उनके लिये बहिन या बहिन का विवाह आदि सभी बाते दूर हो गयी उन्हे केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति की खबर रह गयी।

विवाह के भाव को ग्यारहवे भाव मे बैठा राहु देख रहा है पंचम भाव मे बैठा केतु देख रहा है दसवे भाव मे बैठा शनि अपनी वक्र द्रिष्टि से इस विवाह के भाव को आहत कर रहा है। गुरु जो सम्बन्ध का कारक है वह अष्टम मे जाकर अपनी सम्बन्ध वाली नीतियों को भूल कर बैठा है,दसवे भाव मे बैठा मंगल चौथे प्रभाव से जातिका के मानसिक कारणो और माता के प्रति अपनी कन्ट्रोल वाली नीति को अपना रहा है अपनी द्रिष्टि जातिका के माता के भाव मे रखकर माता को अपने प्रभाव मे रख रहा है और ननिहाल जो केतु का कारक होकर पंचम मे विराजमान होकर अपने प्रभाव को देख रहा है तथा जातिका की प्राथमिक शिक्षा को अपने अनुसार देने के बाद जातिका की शादी आदि की बात की तो यह मंगल जातिका के ननिहाल परिवार को भी मारक द्रिष्टि से देख रहा है। जातिका की उम्र तेतीस साल हो चुकी है,केतु की दशा चल रही है,केत मे शनि का अन्तर चल रहा है इसलिये जातिका शिक्षिका के रूप मे अपने निवास स्थान पर ही रह रही है और छोटे से स्कूल मे अपनी शिक्षा को देकर माता की सहायता कर रही है जबकि पिता का कोई भी सहारा जातिका और जातिका की माता को नही मिल रहा है। जातिका की ताई का कहना है कि जातिका की शादी उसके रिस्तेदारो मे कर दी जाये लेकिन जातिका की ताई के रिस्तेदार शराब कबाब आदि से बिगडे हुये लोग है,इसलिये जातिका उन लोगो से शादी नही करना चाहती है,जातिका के ऊपर जातिका के परिवार वाले नजर भी रख रहे है जिससे वह अपने प्रभाव को देकर और पंचम केतु का सहारा लेकर किसी के साथ भाग भी नही जाये,लेकिन यह केतु अपने प्रभाव को छठे भाव मे आकर अपना असर देने लगेगा,जातिका का कमन्यूकेशन फ़रवरी दो हजार तेरह मे किसी शिक्षा मे साथ रहे व्यक्ति से बन जायेगा और और गुप्त रूप से सम्बन्ध बनाकर कोर्ट मैरिज या इसी प्रकार के काम कर लिये जायेंगे। यह अपने अनुसार एक साल तक गुप्त निवास करेंगे और फ़रवरी दो हजार चौदह से शुक्र की दशा लगने पर तथा गुरु का गोचर सप्तम मे आते ही सामाजिक रूप से रहने के लिये अपना प्रभाव देने लगेंगे.

बहुविवाह दोष और परिहार के उपाय

जातक के जन्म के समय मे गुरु शुक्र मंगल चन्द्र बुध केतु शनि राहु सभी ग्रह दोहरे जीवन साथी के लिये तभी उत्पन्न करते है जब यह ग्रह एक या अधिक संख्या में दोहरे स्वभाव वाले भाव मे उपस्थित होते है,भाव के बाद राशिया भी अपनी युति को प्रदर्शित करती है और ग्रह भी गोचर से अपने प्रभाव को प्रदर्शित करते है। मेष लगन मे सप्तम स्थान मे दोहरे स्वभाव की राशि तुला होती है,साथ ही कुटुम्ब भाव मे भी दोहरे स्वभाव की राशि वृष होती है,इन राशियों मे किसी भी ग्रह का उपस्थित होना दोहरे सम्बन्धो के लिये अपने प्रभाव को देना शुरु कर देगा। लगनेश मंगल इन राशियों अपना स्थान बनाता है तो भी और शुक्र अपना स्थान बनाता है तो भी दोहरे सम्बन्ध माने जायेंगे। विवाह होने के लिये एक साथ कई कारण पैदा होते है,जैसे बुध बातचीत मे आता है गुरु सम्बन्ध की छाप देता है और शुक्र कामक्रिया का कारक है,इसी प्रकार से मंगल उत्तेजना देता है शनि उत्तेजना को ठंडा करने के लिये अपनी शक्ति को देता है लेकिन राहु उत्तेजना को बढाने का काम करता है। कर्क वृश्चिक मीन का राहु अपने सम्बन्धो को भुलाकर भी सम्बन्ध बनाने के लिये अपनी धारणा को देता है जैसे कुल सम्बन्धो के लिये भी यही बात देखी जाती है साथ ही एक ही परिवार मे भाई बहिन जैसे रिस्ते भी कभी कभी राहु की शक्ति के कारण अनदेखे किये जाते है और प्रणय सम्बन्ध बनाकर उन्हे भी कलुषित कर दिया जाता है। गुप्त सम्बन्धो का बनना और गुप्त सम्बन्धो को क्रिया मे शुरु होना दो भावो के स्वामियों पर निर्भर करता है। इसके लिये छठे और आठवे भावो के साथ उनके मालिको के चक्कर मे जब लगनेश आजाते है और अलग अलग भावो के मालिक लगनेश के साथ आमने सामने की युति को बनाने लगते है तो सम्बन्ध गुप्त रूप से बन भी जाते है और उनका क्रिया मे होना भी मान लिया जाता है। पंचमेश और लगनेश का साथ होना या पंचमेश और लगनेश का आमने सामने होना,राहु मंगल या गुरु अथवा शुक्र का साथ देना गुरु शिष्य के नाते को भी खत्म कर देता है। षष्ठेश लगनेश और पंचमेश की युति या आमना सामना माता की बहिन यानी मौसी जैसे नापाक रिस्ते को गुप्त रिस्ते के कारण बद कर देता है। लगनेश का अष्टम मे होना और केतु का साथ होना भी सभी रिस्तो को ताक मे रखकर कामुकता की शांति के लिये रिस्ता बना लिया जाता है। इन कारणो से बचने के लिये ही अलग अलग समाजो ने अपने अपने नियम बनाकर दूरिया बनाने और रिस्तो को पाक साफ़ रखने की बात की है।

उडीसा मे कई समुदाय रिस्तो को अपने समुदाय के अन्दर ही करते है जबकि यूपी और बिहार आदि के साथ राजस्थान में हरियाणा मध्य प्रदेश महाराष्ट्र मे समुदाय के रिस्ते से दूर का रिस्ता देखा जाता है यानी गोत्र भी बचाये जाते है और दादी नानी आदि के गोत्रो से दूर रहा जाता है। जबकि कई जातियों मे रिस्ता किया जा सकता है तो केवल माता के भाई के लडके के साथ या माता के भाई की लडकी के साथ इस प्रकार से प्राकृतिक रूप से ममेरी और फ़ुफ़ेरी बहिन का रिस्ता भी समाप्त हो जाता है और उन लोगो के कहने का अर्थ यह भी होता है कि खून के रिस्तेदार अपनत्व लेकर चलते है जबकि बाहरी लोग समाज व्यवस्था पारिवारिक व्यवस्था खानपान को साथ लेकर नही चल पाते है और अक्सर विवाह टूटते हुये देखे जा सकते है। राहु से सम्बन्धित जातिया भी रिस्तो के प्रति अधिक दूरिया नही देखती है यही हाल केतु से सम्बन्धित मानवीय समुदाय मे देखा जा सकता है। जबकि मंगल से सम्बन्धित रिस्तेदारो मे आपसी रिस्तो को और खून के रिस्तेदारो को देखा जाता है जबकि बुध से समन्धित समुदायो मे धन और सामाजिक बल के बडे हुये रूप को देखकर रिस्ते किये जाते है। गुरु से समन्धित समुदायों गोत्र और कई बातो का परिहार किया जाता है जबकि शुक्र से सम्बन्धित समुदायों जाति पांति धर्म आदि को नही देखा जाता है। शनि वाले समुदायों मे भी गोत्र आदि का बहुत ध्यान रखा जाता है और किसी प्रकार से कोई उच्च जाति का जीवन साथी किसी कारण से आ भी जाता है तो उसे शादी का बुखार उतरते ही सत्यता मे जाते ही अपने रिस्ते को समाप्त भी करना पड जाता है या वह दूर जाकर अपनी वैवाहिक जीवन को जीने के लिये मजबूर हो जाता है।

जन्म समय के गुरु का प्रभाव अगर किसी खराब ग्रह से कलुषित हो रहा है तो भी नाजायज सम्बन्ध बन जाते है और जन्म समय के गुरु का असर किसी गलत ग्रह पर पड रहा है तो नाजायज रिस्ता भी जायज बनाकर समाज मे ग्रहण कर लिया जाता है,कहने का मतलब यह है कि गुरु अगर जन्म समय मे ठीक है और अपने प्रकार को सही दिशा मे प्रदर्शित कर रहा है तो जातक का जीवन सही रिस्तो की तरफ़ जायेगा और सम्बन्धो के मामले मे दिक्कत नही आयेगी मगर गुरु का प्रभाव अगर गलत है तो जातक अपने जीवन मे जब भी गुरु किसी भी ग्रह के साथ गोचर करेगा उसका खराब ग्रह से दूषित भाव सम्बन्धो के प्रति गलत प्रभाव ही देगा।

चन्द्रमा जब अष्टमेश षष्ठेश सप्तमेश द्वितीयेश से सम्बन्ध कर रहा हो उस समय राहु केतु या मन्गल भी साथ दे रहे हो तो मानसिकता को साफ़ रखने के लिये युति वाले ग्रह के साकार कामो को करने लग जाना चाहिये। काम करना और काम मे रत होना दोनो अलग अलग है काम को कार्य भी कहते है और काम को यौन सुख के लिये भी देखा जाता है.यौन सुख की लालसा के समय मे कार्य को करने लग जाना चाहिये इस प्रकार से यौन सुख की लालसा कार्य रूप मे फ़लदायी हो जायेगी जबकि यौन सुख मे जाने से शरीर को भी बरबाद करेगी और शक्ति की कमी तथा बदनामी को भी प्रदान करेगी. यात्रा करना और जल विहार करना बागवानी मे मन को लगा लेना कैमिकल के काम करने लग जाना तकनीकी रूप से कार्यो का करने लग जाना विद्या के क्षेत्र मे नयी नयी विद्या को ग्रहण करने लग जाना,खट्टी और उत्तेजक भोज्य पदार्थो पेय पदार्थो को त्याग देना चन्द्रमा की मानसिक दशा मे लाभदायी हो जाते है,गोमती चक्र इसके लिये एक अचूक उपाय है चांदी मे बनवाकर कमर मे धारण करने से कामोत्तेजना मे शांति मिलती है दिमाग मे चलते हुये गलत विचार शुद्ध होने लगते है। यह भी ध्यान रखना चाहिये कि केतु उस समय साधन देता है राहु उस साधन को प्रयोग करने का अवसर देता है राहु केतु के प्रभाव से भी बचने का कारण समझकर चलना चाहिये.

शरीर मे उत्तेजना तभी आती है जब स्त्रियों के शरीर मे रज की मात्रा बढती है और पुरुष के शरीर मे वीर्य की मात्रा का बढना होता है। अक्सर जो लोग पसीना बहाने का काम नही करते है अधिकतर बैठे रहते है और उनके लिये दिमागी काम करने का समय भी कम होता है उन लोगो के लिये रज और वीर्य को साधने का कार्य करना चाहिये इसके लिये योग करना व्यायाम करना हाथ पैरो को चलाने का काम करना जिम जाना आदि भी ठीक रहता है इस प्रकार से रज और वीर्य बढने के कारण पसीना आने से दूर होने लगते है। जब भी लगे कि मन भटक रहा है उस समय अपने धर्म और रीति नीति के अनुसार चलने लग जाना चाहिये,कारण को कारकत्व मे बदलने का उपक्रम सोचना चाहिये।

राहु भीड का कारक भी होता है और शुक्र चमक दमक को देने वाला भी होता है,राहु शुक्र के साथ मिलकर शरीर मे भयंकर उत्तेजना को भी प्रदान करता है और चमक दमक को देखकर वासना की उत्पत्ति भी करता है। मंगल के समय मे यानी पच्चीस साल से लेकर पचास साल की उम्र तक इनका वेग बहुत अधिक होता है,लेकिन उम्र की तेरह साल की अवस्था से लेकर उन्नीस साल की अवस्था को केतु से जोड कर देखा गया है इस समय मे दिमाग को घुमाने के लिये फ़ोटोग्राफ़ी कलात्कम कारणो का सृजन करना अपने नाम को आगे बढाने के लिये अपने शिक्षा सम्पत्ति को बढाने के उपक्रम करने से फ़ुर्सत मे नही लाना चाहिये इस प्रकार से यह योग फ़ायदा भी दे जायेंगे और मानसिक रूप से मन भी खराब नही होगा और शरीर की भी सुरक्षा बनी रहेगी। भीड भाड वाले क्षेत्र से दूर रहना चाहिये जहां सामूहिक भोजन और नाचगाना आदि होता है वहां से किनारा कर लेना चाहिये,जहां चमक दमक और पहिनावे को विशेष महत्व दिया जाता है वहां जाने से बचना चाहिये आदि कारण उत्तेजित होने वाले कारको से दूर रखने मे सहायक हो सकते है।

Sunday, April 15, 2012

भूतनी

पुरुष के जीवन मे अगर मर्यादा है पारिवारिक स्वाभिमान है चरित्र से वह जीवन मे सही रूप से चलने वाला है अपने खानपान पर उसे सात्विकता की पहिचान है,धर्म पर चलने वाला है तो एक प्रकार का तेज उसके माथे पर चमकने लगता है,वह तेज एक तो सात्विक विचारो से उत्पन्न होता है दूसरे वह अपने जीवन मे उन्न्ति के मार्ग पर बहुत आगे बढ जाने वाला होता है तीसरे एक नारी ब्रह्मचारी की कहावत के अनुसार वह पौरुषता मे भी बढ चढ कर होता है। महर्षि विश्वामित्र की तपस्या को खंडित करने के लिये जिस प्रकार से रम्भा नामकी अप्सरा ने इंद्र के कहने से उनकी ब्रह्मचर्य की अखंडता को समाप्त किया था उसी प्रकार से अगर इस कलयुग मे भी कोई व्यक्ति अपनी मर्यादा मे रहकर चलना चाहता है तो उस व्यक्ति के आसपास ही कितनी रम्भा आकर उसकी चरित्र की पौरुषता की अखंडता को विदीर्ण करने के लिये अपने आप बिना बुलाये आजाती है और अपना काम करने के बाद चली जाती है,वह व्यक्ति जो अपनी मर्यादा मे चल रहा था अपने कार्य से कार्य रखने का कारण ही समझता था जिसे अपने परिवार और समाज से बहुत अच्छा सहयोग मिलता था जो नेक चलनी के लिये जाना जाता था उसे पथ से विचलित करने के बाद जब इसी प्रकार की रम्भाये आती है तो वह अपने आप ही कलयुगी जामे को धारण कर लेता है उसके बाद एक साधारण आदमी मे और उसमे कोई फ़र्क नही रह जाता है। मैने पहले भी लिखा है कि कुम्भ राशि के व्यक्ति मित्र बनाने की कला मे निपुण होते है वे भावनाओ की गहराई को जानते है और कहां किस प्रकार से भावना को आहत करना है इस बात का गूढ उन्हे पता होता है इसका कारण होता है कि कुम्भ राशि के छठे भाव मे चन्द्रमा की राशि कर्क होती है और चन्द्रमा खुद उनके लिये मित्र बनाने की कला मे निपुण कर देता है। एक बात और भी देखी जाती है कि जब कोई नया पशु जो मादा हो और वह नये नर पशुओं के बाडे मे आजाये तो हर नर पशु को उसे भोगने के लिये अपनी अपनी शक्ति का प्रयोग करने लगता है,उसी प्रकार से जब कोई सामाजिक मर्यादा मे पहिनावे मे चाल चलन मे अपनी संस्कृति के अनुसार रह रहा हो और उसके बीच मे कोई नये पहिनावे वाला अपने को दूसरो से अलग दिखाने वाला हर बात मे स्पष्ट कहने वाला आजाये तो लोग अपनी संस्कृति पहिनावे और बोलचाल से दूर हटकर नये पन मे जाने के लिये उस व्यक्ति की तरफ़ आकर्षित हो जाते है। वक्री गुरु और मार्गी गुरु इस बात के लिये अपनी पहिचान बता देते है,जब कुंडली मे वक्री गुरु होता है तो वह मार्गी गुरु के विपरीत चलता है। यानी मार्गी गुरु जब धर्म और आध्यात्मिकता को लेकर चलने वाला होता है किसी भी प्रकार के सम्बन्ध को आजीवन चलाने वाला होता है तो वक्री गुरु केवल स्वार्थी भावना से अपने को समाज और मर्यादा से दूर रखकर विदेशी पहिनावे मे ले जाकर अपने को पूरी तरह से खुला रखकर सामने आता है,वैसे तो दबे स्वर मे लोग उसकी बुराई करते है लेकिन सामने आकर उसकी बुराई भी नही कर पाते है। कालिदास ने अपने ग्रंथ "बृहद शकुंतलम" में राजा दुष्यन्त और शंकुतला के चरित्र को इसी मार्गी और वक्री गुरु की उपाधि से विभूषित किया है। राजा दुष्यन्त का गुरु वक्री था और शकुंतला का मार्गी था,राजा दुष्यन्त ने अपने वन विहार के समय शकुन्तला के रूप और लावण्य को देखकर गन्धर्व विवाह कर लिया था तथा प्रणय के बाद उसे एक अंगूठी देकर चले गये थे,कि शकुन्तला जब राजा दुष्यंत के दरबार मे उससे मिलने के लिये आये तो वह उस अंगूठी को दिखा दे,जिससे वे उसे पहिचान जायेंगे और अपना लेंगे,कुछ दिन बाद वह अंगूठी सरोवर में स्नान के समय मे गिर गयी और उसे एक मछली निगल गयी। जहां दुष्यन्त को शकुन्तला का कोई ख्याल नही था,वही शकुन्तला राजा दुष्यन्त के प्रणय के बाद अपने पुत्र भरत के साथ वन मे ही निवास करने के बाद हमेशा राजा दुष्यन्त के ख्यालो मे ही खोई रहने लगी,जब वही वक्री गुरु प्रणय के समय के गुरु के साथ बारह साल बाद गोचर मे आया तो उस मछली को मछुआरे ने मारा और राजा दुष्यन्त के राज्य की मुद्रा से अंकित अंगूठी को राजा दुष्यंत को दी तब जाकर राजा दुष्यंत को शकुन्तला का ख्याल आया और वे शकुन्तला को लेने के लिये उसी जंगल मे पहुंचे जहां उनका पुत्र शेर के दांत गिनने में मशूगल था। वक्री गुरु को अपना काम करने के बाद स्वार्थी भावना से याद नही रहता है कि उसे और कोई भी सम्बन्ध के मामले मे मर्यादा का निर्वाह करना है वह अपने उद्देश्य की पूर्ति के बाद अपने दूसरे उद्देश्य के लिये शुरु हो जाता है और उसे यह भी ख्याल नही रहता है कि उसे जिस सीढी तक पहुंचाया गया है उसके नीचे भी कोई है,उसे केवल आगे बढने और अपनी इच्छाओं की तृप्ति केलिये ही ख्याल रहता है,जो लोग उसकी कार्य शैली मे आये होते है वे भले ही उसकी याद मे अपने को तिल तिल कर जला ले लेकिन उसे इन बातो से कोई लेना देना नही होता है।

उपरोक्त कुंडली में चन्द्रमा से गुरु और शनि अष्टम भाव मे है और वक्री है,शनि वक्री बजाय मेहनत करने के बुद्धि से काम करता है,जबकि वक्री गुरु बजाय सम्बन्ध निभाने के केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति को ही करने के लिये अपने दिमाग को लगाये रहता है.गुरु धन का मालिक है और शनि लगन का मालिक है,गुरु लाभ का भी मालिक है,तो शनि खर्च का भी मालिक है,अष्टम भाव विदेशी परिवेश से युक्त माना जाता है जातिका जिसकी यह कुंडली है अपने को विदेशी परिवेश मे रखने के लिये तथा साफ़ और स्पष्ट बोलने के लिये अपनी कामुकता को प्रदर्शित करने के लिये तथा एक ही उद्देश्य लेकर चलने वाली कि वह कैसे भी कहीं भी अपने दिमाग का प्रयोग करने के बाद अधिक से अधिक धन को प्राप्त कर ले उसकी नजर मे कोई हो केवल उसकी स्वार्थ की पूर्ति हो जाये और वह जिस काम को चाहती है वह काम हो जाये भले ही वह अपने चरित्र को गंवा दे कोई दिक्कत नही है भले ही वह किसी चरित्रवान का चरित्र भ्रष्ट कर दे उसे कोई लेना देना नही है भले ही उसकी याद मे कोई आजीवन आहे भरता रहे उसे कोई मतलब नही है उसे मतलब है तो केवल अपनी स्वार्थी भावना को पूर्ण करने के लिये कोई भी काम करना। अक्सर ऐसे लोगो को देखा जाता है कि वे अपने को अपने समाज से अलग दिखाकर अपनी तरफ़ लोगो को आकर्षित करने के लिये कारणो को प्रयोग करना। यह बात पुरुषो मे भी देखी जाती है कि वे कुछ नही तो अपनी दाढी मूंछ को ही विचित्र तरीके से कटवा कर चलने लगेंगे,जो पहिनावा पहिना जा रहा है उसे इस प्रकार से पहिनेंगे कि वे दूसरो से अलग थलग होकर दिखाई देने लगें। स्त्रियां पुरुषो को आकर्षित करने के लिये और पुरुष स्त्रियों को आकर्षित करने के लिये इस प्रकार के प्रभाव को प्रदर्शित करने लगते है।

वक्री गुरु वाले जातक एक स्थान पर टिक कर नही रह सकते है,अगर वे एक स्थान पर टिके भी है तो उनका दिमाग एक स्थान पर नही रहता है,उन्हे अपने माता पिता भाई बहिन परिवार समाज से कोई लेना देना नही होता है,जब कोई सामाजिक काम होता है या कोई परिवार का धार्मिक काम होता है तो वे उसे सामाजिकता और धार्मिकता से नही ग्रहण करते है उसके परिणाम की प्रतीक्षा करते है,अक्सर इस प्रकार के कार्य उनके लिये एक मनोरंजन से अधिक कुछ भी नही है। शादी विवाह के सम्बन्धो मे भी देखा जाता है कि कभी भी अपनी रिस्ते वाली बातो को निभाकर चलने वाले नही होते है,अगर असमर्थ होकर निभाना भी पडता है तो वे या तो परिवार से या समाज से कट कर ही रहते है और उन कामो को करते रहते है जो उनके परिवार और समाज मे कभी किये नही गये है। यह एक काम और भी बहुत अच्छा करता है कि इस प्रकार के गुरु वाले जातको को पुरुष संतान या तो देता नही है और देता भी है तो वह सन्तान का सुख नही दे पाता है उसका कारण भी है कि जब सन्तान पैदा होती है तो गुरु मार्गी होता या अस्त होता है। गुरु और शनि जब अष्टम मे वक्री होकर बैठे हो तो जातिका का साथ केवल अन्तरंग सम्बन्धो की सन्तुष्टि से आगे कुछ भी नही होता है,अगर कोई व्यक्ति इस ग्रह युति की जातिका से आजीवन सम्बन्ध बनाकर चलने वाली बात को सोचे तो उसका सोचना गलत होगा कारण जातिका को पता है कि वह जितना ले सकती थी उसे सन्तुष्टि मिल चुकी है और वह अपने नयेपन और नये अनुभव की तलास मे आगे चली गयी होती है। वक्री गुरु से जब मंगल अष्टम मे होता है तो इस प्रकार के जातक यौन रोगों से ग्रसित होते है,वक्री गुरु से जब बुध अष्टम मे होता है तो उनकी काम क्रिया मे महसूस करने वाली शक्ति का पता नही होता है,अष्टम वक्री गुरु से जब सूर्य अष्टम मे होता है तो अक्सर एड्स जैसे रोग पाये जाते है जिनका कोई इलाज नही होता है। अष्टम वक्री गुरु से जब शुक्र अष्टम मे होता है तो इस प्रकार के जातक अक्सर काम क्रिया मे निपणता को हासिल कर लेते है और अपनी काम सन्तुष्टि से मन चाहे धन और सुख सुविधा को प्राप्त करने के बाद बदले मे सन्तुष्टि देने वाले व्यक्ति को रोग भी दे जाते है पथ से भ्रष्ट भी कर जाते है,मर्यादा और परिवार मे आग भी लगा जाते है व्यक्ति की उन्नति की क्रियाओ को समाप्त कर जाते है,धर्म और अन्य प्रकार के मोक्ष वाले साधनो से दूर भी कर जाते है। इस प्रकार की जातिकाओं का रूप एक भूतनी से अलग नही है.